A place of spiritual retreat and meditation.
Come and connect with your soul.
Experience inner peace and spiritual growth.
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Soham Dhyan Kendra

Founded in memory of the parents by Pawan Kumar Gupta, a follower of Guru Maharaj, Soham Meditation Centre is a non-profit organization dedicated to empowering human potential. The organization is a human service organization that recognizes the potential of every individual to empower others. Soham Meditation Center invites you to transform your life through meditation, you will increase your focus and sense of purpose and experience transformative spiritual growth.

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गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

Param Sant Shrimati Darshana Devi

Param Sant Dr. Chandra Gupta Ji

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Tatra Pratyayakata Nata Dhyanam. This Yo GaSutra means- meditation is where the mind is concentrated and the constant movement of the instincts in it. Dharana does not mean bringing the mind to one place or making it stop, but meditation means wherever the mind is fixed, the constant movement of the instincts is called meditation. Staying awake in it is meditation.
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At the Aashram, daily life revolves around spiritual practices aimed at inner peace and self-discovery.

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दार्शनिक दृष्टि से नाद और नाम जप में यह अंतर है कि नाम जप एक क्रिया है जिसमें ईश्वर या गुरु के नाम का स्मरण या उच्चारण होता है, जबकि नाद वह अंतरात्मा में उत्पन्न होने वाली दिव्य और अनाहत (बिना किसी बाहरी स्रोत के) ध्वनि या ऊर्जा है। नाम जप मन के माध्यम से किया जाता है, जो बाहरी शब्दों और भावनाओं से जुड़ा होता है, लेकिन नाद एक आध्यात्मिक अनुभव है जो मन और संवेग से ऊपर उठकर चेतना के भीतर सतत गूंजता रहता है।नाम जप में साधक का मन शुद्ध होकर उस नाम में लीन होता है, जिससे ध्यान और भक्ति की स्थिति उत्पन्न होती है; यह क्रिया बाहरी रूप से साधना का एक अंग है। दूसरी ओर नाद वह अंतर्निहित स्वर है जो अनहद नाद के रूप में कहा जाता है, जो ध्यान और समाधि की गहराई में अनुभव होता है, और यह शुद्ध चेतना या आत्मा का स्वरूप है। नाद जन्मजात और साधना द्वारा जागृत दोनों हो सकता है, जबकि नाम जप एक विधि या साधना है

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जब हम किसी भी ईश्वर को याद या उसके ड्सर्शन करते है और नाम जपते है तो हम जाप करते हुवे शांति तो अवश्य मबसूस करते है ये अहसास अवश्य रहता है हम जाल कर रहे है पर मन हमारा जाप की गिनती में लगा रहता है और मन मे सोच रहती है कि हम इश्वर का जाप कर रहे है वर्षो बीत जाते है और हमे शरीर मे कोई हलचल या अंदुरुनी अनुभूति या कोई नाद हमको सुनाई नही देती ये तभी सुनाई देती है जब हममे पुर्णता हो या किसी योग्य गुरु के द्वारा तववजुह दे हमारे अंदर शक्तिपात कर ऊर्जा उतपन्न कर पूर्ण शरीर मे उस धुन को रमा दिया गया हो ये बिना समाधि या केवेली स्तिथि के आये संभव नही है ये जन्म जन्मो के संस्कार से बी व गुरु के आशीर्वाद से ही मिल सकती है और हमे शक्तिपात की गई ऊर्जा जो शरीर मे हरक़त करती है वही हमे हरकत गुरु या ईश्वर की याद दिलाने वाली होती है वहः चाहे जो हो वहः vibration, स्पर्श या ख्याल उत्पन्न होता है, वही सच्चा अनाहद नाद है। अनाहद नाद वह अद्भुत, अनाहत और निरंतर दिव्य ध्वनि है जो बिना किसी बाहरी कारण के भीतर से स्वतः प्रकट होती है। इसे कोई भी नाम दे, जैसे मंत्र, जप, कीर्तन या ध्यान में जो नाद या कंपन महसूस होता है, वह आध्यात्मिक चेतना का स्रोत है और ईश्वर की स्मृति का स्वरूप है।अनाहद नाद की साधना में योगी या साधक मन को शून्य की अवस्था में ले जाकर उस दिव्य नाद को सुनता है, जो शून्य से उत्पन्न होता है। यह नाद आहद (सुनाई देने वाली आवाज़) से पहले की शुद्ध स्थिति है, जो शून्यता और चेतना का मर्म है। ध्यान के दौरान घंटी, वीणा, बांसुरी, समुद्र की लहर तथा अन्य दिव्य आवाज़ें सुनाई देना इसी अनाहद नाद के उदाहरण हैं। इन ध्वनियों का अनुभव करने से मन शांत होता है और व्यक्ति ईश्वर की ओर अधिक स्मरण की ओर प्रवृत्त होता है।गुरु की दीक्षा से और सतत साधना से यह अनाहद नाद स्पष्ट और प्रभावशाली रूप से अनुभव होता है, जो अंततः समाधि और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। यह नाद केवल एक मानसिक या शारीरिक कंपन नहीं, बल्कि ईश्वर के साथ आत्मा का संपूर्ण मेल है। इसलिए कहा गया है कि जो भी vibration या ध्यान गुरु/ईश्वर की याद दिलाता है, वही सच्चा नाद है और यही अनाहद नाद का भाव है।अतः, ईश्वर की याद स्मरण करना ही अनाहद नाद के अनुभव का मुख्य आधार है, और यह स्मृति साधक को ब्रह्म-चेतना की ओर ले जाती है। इस दृष्टि से आपका कथन पूर्णतः सही है।यह जानकारी हिंदी आध्यात्मिक स्रोतों से मिली है जो अनाहद नाद के विभिन्न अनुभवों, साधना और प्रभावों को स्पष्ट करती हैं

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कर्मयोग को श्रीकृष्ण यो मूल श्लोकभगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 47 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ इसका हिंदी अर्थ है: तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कभी भी कर्मफल के हेतु मत बनो और न ही कर्म न करने में आसक्त हो। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि कर्म करना अनिवार्य है, पर फल की इच्छा या आसक्ति त्यागनी चाहिए, जो आपके विचार से पूर्णतः मेल खाता है। ईश्वर-स्मरण का उपदेशअध्याय 12, श्लोक 8 में कहा गया: मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ अर्थ: अपने मन को केवल मुझमें ही लगाओ, अपनी बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो। इस प्रकार तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं। यह भक्ति का सार है, जो सतत इष्ट-स्मरण की शिक्षा देता है, जिससे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। भक्ति का चरम संदेशअध्याय 18, श्लोक 66: सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो। यह गीता का अंतिम उपदेश है, जो कर्म के साथ पूर्ण समर्पण और स्मरण पर जोर देता है। जन्म, मरण, काल और स्थान जैसा सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है, जबकि इंसान को कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन कर्म के फल की प्राप्ति इसी जन्म में होना निश्चित नहीं होता। इसी लिए सतत अपने इष्ट (ईश्वर, गुरु या किसी आध्यात्मिक आकांक्षा) को याद रखना आवश्यक रहता है।यह दृष्टिकोण भगवद् गीता के उपदेशों से मेल खाता है, जिसमें कहा गया है कि कर्म करो पर फल की इच्छा त्याग दो। कर्म करना हमारा धर्म है, पर फल ईश्वर की मर्जी पर निर्भर है। इस स्थिति में:सतत ईश्वर-स्मरण से मन शांत रहता है और कर्म भी बिना आसक्ति के होता है।फल की चिंता न करके कर्म में निरन्तरता बनी रहती है।ईश्वर का उस्मरण भक्त को मोहमाया से ऊपर उठने में मदद करता है।इसी भक्ति और स्मृति के बल पर जीवन का उद्देश्य सिद्ध होता है।आपके विचार में यह भी सशक्त संदेश है कि फल का स्वामी ईश्वर है, इसलिए मनुष्य को कर्म करते हुए अपने इष्ट का स्मरण करना चाहिए। यह याद दिलाता है कि आध्यात्मिक साधना और कर्म दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।

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