A place of spiritual retreat and meditation.
Come and connect with your soul.
Experience inner peace and spiritual growth.
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Soham Dhyan Kendra

Founded in memory of the parents by Pawan Kumar Gupta, a follower of Guru Maharaj, Soham Meditation Centre is a non-profit organization dedicated to empowering human potential. The organization is a human service organization that recognizes the potential of every individual to empower others. Soham Meditation Center invites you to transform your life through meditation, you will increase your focus and sense of purpose and experience transformative spiritual growth.

Masters (Gurus)

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

Param Sant Shrimati Darshana Devi

Param Sant Dr. Chandra Gupta Ji

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Prayers & Rituals

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Tatra Pratyayakata Nata Dhyanam. This Yo GaSutra means- meditation is where the mind is concentrated and the constant movement of the instincts in it. Dharana does not mean bringing the mind to one place or making it stop, but meditation means wherever the mind is fixed, the constant movement of the instincts is called meditation. Staying awake in it is meditation.
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At the Aashram, daily life revolves around spiritual practices aimed at inner peace and self-discovery.

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राजयोग की पारंपरिक भाषा और आपके गुरु–शिष्य–समर्पण वाले भाव में सात आंतरिक अवस्थाओं के रूप में समझ सकते हैं। ये कोई सार्वभौमिक या वैज्ञानिक रूप से निश्चित सात चरण नहीं हैं, बल्कि साधना-अनुभव को समझने का एक आध्यात्मिक ढाँचा है। सहस्रार से समाधि तक — गुरु-कृपा की सात आंतरिक अवस्थाएँ सहस्रार से समाधि तक गुरु-कृपा की सात आंतरिक अवस्थाएँ १. तवज्जोह — भीतर का द्वार खुलना गुरु की कृपा और तवज्जोह से साधक की बिखरी हुई चेतना भीतर की ओर मुड़ती है। ध्यान में नाद, प्रकाश, स्पंदन या गहरी शांति का अनुभव हो सकता है। यहाँ गुरु बाहर दिखाई देने वाले व्यक्ति से आगे बढ़कर साधक के लिए अंतर्यात्रा का मार्गदर्शक बन जाता है। २. अनाहद नाद — भीतर की ध्वनि जब मन बाहरी शब्दों से हटकर भीतर स्थिर होने लगता है, तो साधक को सूक्ष्म नाद का अनुभव हो सकता है। यह नाद साधक के लिए ध्यान का आधार बन जाता है। परंतु लक्ष्य केवल नाद सुनना नहीं— नाद के पीछे की निःशब्द सत्ता को पहचानना है। ३. सहस्रार — चेतना का ऊर्ध्वगमन साधना में कभी-कभी चेतना के सहस्रार की ओर उठने जैसा अनुभव होता है। प्रकाश, विस्तार, भारहीनता या अद्भुत शांति का अनुभव हो सकता है। यहाँ साधक को समझना होता है कि अनुभव आया है, इसलिए यात्रा समाप्त नहीं हुई। ४. साक्षीभाव — अनुभव से परे देखना अब साधक अनुभवों को पकड़ने के बजाय उन्हें देखने लगता है। प्रकाश आया—देखा। नाद आया—सुना। शांति आई—अनुभव की। विचार आया—उसे भी देखा। धीरे-धीरे प्रश्न बदलता है— “मुझे क्या अनुभव हो रहा है?” से “इन सबका साक्षी कौन है?” यहीं से यात्रा और भीतर उतरती है। ५. अहं का क्षय — ‘मैं’ का हल्का होना गुरु-कृपा और समर्पण से साधक के भीतर का दावा कम होने लगता है— “मैं साधक हूँ।” “मैंने अनुभव किया।” “मैं पहुँच गया।” इन सबके स्थान पर केवल कृतज्ञता बचती है— “जो हुआ, उसकी कृपा हुई।” यही वह मोड़ है जहाँ आध्यात्मिक अनुभव अहंकार का कारण बनने के बजाय अहंकार को गलाने लगता है। ६. समाधि — भेद का विलय समाधि को केवल किसी विशेष प्रकाश, नाद या शारीरिक अनुभूति से परिभाषित नहीं किया जा सकता। योग परंपरा में यह चेतना की अत्यंत गहन एकाग्रता और अंततः विषय–ध्यान–ध्यानकर्ता के भेद के क्षीण होने से जुड़ी अवस्था है। आपके भाव में— मैं → गुरु → वो की यात्रा धीरे-धीरे ऐसी स्थिति की ओर जाती है जहाँ ‘मैं’ और ‘तू’ का अलगाव अत्यंत सूक्ष्म हो जाता है। ७. परिपूर्णता — जीवन में उतरता हुआ अनुभव सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा ध्यान के भीतर नहीं, ध्यान के बाद के जीवन में होती है। यदि अनुभव के बाद— अहंकार कम हो, मोह ढीला पड़े, करुणा बढ़े, कर्म अधिक निष्काम हों, दूसरों के प्रति समानता आए, गुरु के प्रति समर्पण गहरा हो, और भीतर शांति स्थिर होने लगे, तो साधना का प्रभाव जीवन में उतर रहा है। तब साधक अनुभव का संग्रहकर्ता नहीं रहता; वह अनुभव के प्रकाश में जीने वाला बनता है। अंतिम रहस्य सहस्रार को खोलना मंज़िल नहीं। नाद को सुनना मंज़िल नहीं। प्रकाश को देखना मंज़िल नहीं। समाधि का अनुभव भी अंतिम दावा नहीं। अंतिम यात्रा ‘मैंने पाया’ से ‘मैं ही कहाँ हूँ?’ तक है। जब गुरु की कृपा से यह ‘मैं’ भी शांत होता जाता है, तब साधक के पास कहने को बहुत कम बचता है— न मैं, न तू, न पाने वाला, न पाने की वस्तु। जो है—वही है। सोऽहम्।

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मैं मिटा तो मेरा पता मिट गया, तू मिटा तो तेरा भी कोई निशाँ न रहा। जब ‘मैं’ और ‘तू’ दोनों...

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प्रसन्नता से। प्रस्तुत है एक विस्तृत आध्यात्मिक चिंतन: Writing सच्ची ईश्वर-भक्ति और वास्तविक अध्यात्म ईश्वर-भक्ति किसी बाहरी प्रदर्शन, वेशभूषा, उपाधि या...

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