हमारी आत्मा को सोते-जागते अनाहद (नाद, शुद्ध चेतना, ईश्वर के साथ निरंतर जुड़ाव) पर बनाए रखने के लिए नियमित साधना और जीवनशैली में बदलाव आवश्यक हैं। इसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
१. ध्यान और साधना
नाद योग या साउंड मेडिटेशन करें, जिससे अंतःनाद (आंतरिक ध्वनि) सुनाई देने लगे।
सोने से पहले और जागने के तुरंत बाद गहरे ध्यान में जाएं।
“सोहम” या “ॐ” का मानसिक जप करें।
२. जागरूकता बनाए रखना
दिनभर में अपने विचारों और भावनाओं को अवलोकित करें।
कोई भी कार्य करते समय उसमें पूर्णतः समर्पित रहें (पूर्ण ध्यान के साथ कर्म करें)।
अधिक से अधिक “साक्षी भाव” में रहने का अभ्यास करें।
३. सात्विक जीवनशैली अपनाएं
शुद्ध, सात्विक और हल्का भोजन करें।
प्रकृति के समीप रहें, जिससे मन स्थिर और शांत रहेगा।
सत्य, प्रेम और दया का पालन करें, जिससे हृदय निर्मल रहेगा।
४. नियमित जप और भजन-कीर्तन
मन में हमेशा किसी मंत्र का मानसिक जाप चलता रहे, जिससे अनाहद नाद के साथ जुड़े रहें।
भजन-कीर्तन या कोई दिव्य ध्वनि नियमित रूप से सुनें।
५. नींद में भी जागरूकता
सोते समय संकल्प लें कि “मैं आत्मा हूँ, मैं अनाहद नाद में स्थित हूँ।”
योगनिद्रा (स्वस्थ नींद और आत्मस्मृति का अभ्यास) करें।
जागते और सोते समय एक ही चेतना बनाए रखें।
यदि इन बातों का नियमित अभ्यास किया जाए, तो धीरे-धीरे आत्मा अनाहद नाद में स्थायी रूप से स्थित हो सकती है और सोते-जागते उसी में लीन रह सकती है।