पिताजी साहब का गुरु पद प्राप्त होने के बाद वो अपने शिष्यों को तवज्जुह या दीक्षा क्लब जाकिर यानी हृदय के समीप आत्मा के स्थान को जाग्रत कर उसको उर्जित कर अनाहद का अनुभव ध्यान की अवस्था मे जब शिष्य बैठता था तो 11 या 21 दिन में उसे अनाहद का अनुभव ही जाता था और शिष्य इसे शरीर मे हरकत की तरह अनुभव करने लगता था और इससाधना पद्दति को अपना लेता था और नित्य ध्यान कर ऊर्जा प्राप्त करता था कुछ कुछ ऐसे लोग भी आते थे उनको विस्वास नही होता था और दिखावे के ये ध्यान पूजा और भक्ति रखते ओर श्रद्धा को जाहिर करते थे बहुत से बार पिताजी कृपा मिलने और उनके भाग्य में या कर्म के अनुसार न होने पर उनमे अविष्वास पैदा हो जाता था या तो सत्संग में आना बंद करदेते या अविष्वास जाहिर कर पीछे हट जाते थे उनके लिए पिताजी का कहना था कि गुरु की तवज्जो (ध्यान, कृपा या ऊर्जा) से अनाहद नाद उत्पन्न नहीं हुआ हो और शिष्य आत्मिक जगत में पूर्णता प्राप्त करना चाहता हो, तो उसे निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:
- स्वयं की साधना को गहरा करें
गुरु का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण है, लेकिन शिष्य की अपनी साधना और लगन भी उतनी ही आवश्यक है।
नियमित रूप से ध्यान, जप, प्राणायाम और अन्य आत्मिक साधनाएँ करते रहें।
संयम, धैर्य और श्रद्धा बनाए रखें।
- गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण करें
अगर शिष्य को गुरु में संपूर्ण रूप से विलीन होना है, तो उसे पूर्ण समर्पण और अहंकार का त्याग करना होगा।
गुरु के वचनों का पालन करें और उनके दिखाए मार्ग पर दृढ़ रहें।
केवल बाहरी तौर पर नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से गुरु के प्रति समर्पण भाव विकसित करें।
- स्वयं को शुद्ध करें
अनाहद नाद या उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियाँ तभी प्राप्त होती हैं जब मन, चित्त और शरीर शुद्ध होते हैं।
सद्गुणों को धारण करें और विकारों को दूर करें।
निष्काम सेवा, प्रेम और करुणा का भाव विकसित करें।
- धैर्य रखें और प्रतीक्षा करें
आत्मिक उन्नति का मार्ग समय ले सकता है।
हर शिष्य की यात्रा अलग होती है, और गुरु की कृपा भी उचित समय पर फलित होती है।
धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें और साधना जारी रखें।
- गुरु से संवाद करें
यदि कोई शंका है या साधना में कोई रुकावट आ रही है, तो गुरु से प्रश्न करें और समाधान प्राप्त करें।
गुरु के साथ एक आत्मिक संबंध विकसित करें—बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से भी।
निष्कर्ष
गुरु की तवज्जो महत्वपूर्ण होती है, लेकिन शिष्य की श्रद्धा, समर्पण और निरंतर साधना से ही आत्मिक पूर्णता संभव है। यदि अनाहद नाद जैसी अनुभूतियाँ उत्पन्न नहीं हो रही हैं, तो शिष्य को धैर्य रखना चाहिए और साधना को और अधिक गहन बनाना चाहिए। धीरे-धीरे गुरु की कृपा और स्वयं के प्रयास से आत्मिक लक्ष्य प्राप्त होगा।