सहज स्मरण: हर पल इष्ट से जुड़ने की कला

यह सत्य है कि जब कोई व्यक्ति कार्यों में व्यस्त होता है, तो उसका ध्यान पूरी तरह अपने इष्ट या अनाहद नाद पर स्थिर रखना कठिन हो सकता है। लेकिन ध्यान और भक्ति का एक गहरा स्तर ऐसा भी होता है जहाँ व्यक्ति बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के निरंतर अपने इष्ट के साथ जुड़ा रहता है। इसे सहज-स्मरण या निरंतर भजन कहा जाता है। इसे बनाए रखने के कुछ उपाय हैं:

  1. स्मरण को स्वभाव बना लेना

यदि कोई व्यक्ति अपने इष्ट का स्मरण केवल बैठकर ध्यान करने तक सीमित रखेगा, तो वह कार्य करते समय भूल सकता है। लेकिन यदि वह दिनचर्या के हर छोटे-बड़े कार्य को अपने इष्ट को समर्पित करके करे, तो स्मरण स्वाभाविक हो जाएगा।

  1. नाम जप का अभ्यास

जब भी समय मिले, मन में इष्ट का नाम जपते रहें। धीरे-धीरे यह एक आदत बन जाएगी और मन खुद-ब-खुद नाम जप करने लगेगा, चाहे आप कोई भी कार्य कर रहे हों।

  1. अनाहद नाद को भीतर महसूस करना

अनाहद नाद सुनाई देना उच्च आध्यात्मिक अवस्था का संकेत है। जब यह प्रकट हो, तो इसे ध्यान से सुनें और अपने इष्ट से इसे जोड़ें। धीरे-धीरे यह अनुभूति आपके जीवन का हिस्सा बन जाएगी।

  1. प्रेम और भक्ति की भावना

केवल मानसिक स्मरण ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इष्ट के प्रति प्रेम और भक्ति की गहराई बढ़ानी होगी। जब प्रेम प्रबल होगा, तो इष्ट का स्मरण स्वतः होगा, जैसे कोई प्रिय व्यक्ति हर समय मन में रहता है।

  1. स्वांस-स्वांस में इष्ट का नाम

हर सांस को अपने इष्ट के नाम से जोड़ें। जैसे साँस अंदर लेते समय ‘ॐ’ और छोड़ते समय ‘राम’ (या अपने इष्ट का नाम) लेने की आदत डालें।

  1. सेवा और सत्संग

अपने जीवन में सेवा और सत्संग को स्थान दें। जब व्यक्ति सच्चे साधकों और संतों के संपर्क में रहता है, तो उसका चित्त इष्ट के प्रति अधिक जागरूक रहता है।

  1. साक्षी भाव विकसित करना

जब व्यक्ति हर कार्य को साक्षी भाव से करता है, तो वह भले ही बाहरी रूप से सक्रिय हो, लेकिन भीतर शांत और अपने इष्ट से जुड़ा रहता है। यह ध्यान का उच्चतम रूप होता है।

इस प्रकार, धीरे-धीरे अभ्यास करके कोई भी व्यक्ति अपने इष्ट का स्मरण 24 घंटे कर सकता है। शुरुआत में यह कठिन लग सकता है, लेकिन जब प्रेम और श्रद्धा प्रबल हो जाती है, तो स्मरण सहज रूप से बना रहता है।

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