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आज फिर जब मैं

आज फिर जब मैं मन के शीशे के सामने पहुचा तो हैरान रह गया शीशा बोला आ गए फिर से  आ जाओ मेरा द्वार...

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उलझन 

पिताजी का फरमाना था कक मन की कोई भी उलझन  यदि हमें परेशान करती है तो उसे यदि गुरु के समक्ष  नही कह पा...

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चिंतन

मैंने पढ़ा था लेकिन जाना नहीं था अपने चिंतन अपनी उलझनों को एक बार पूरे मन से व्यक्त कर दिया जाए लिख दिया जाए...

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ज्ञान और गुरु

बिना ज्ञान और गुरु के कुछ भी संभव नही है इसलिये जीवित ओर पूर्ण गुरु मिलना इस जीवन मे जरूरी है जो हमे ज्ञान...

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मोक्ष कि अवस्था

कोई सदाचारी साधक सूक्ष्म ध्यान के द्वारा आंतरिक ब्रहमज्योती और ब्रह्म नाद (शब्द) को प्राप्त करता है, तब उसे आत्मज्ञान होता है साथ ही...

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