अगर कोई साधक एक मत हो कर नाद को लगातार महसूस कर निर्लिप्त समाधि में लय हो जाये तो उसे वो मुकाम हकसिल हो जाता है जो कई वर्षों की तपश्या या साधना से नही मिलता ये सब गुरु कृपाआपने जो कहा है, वह नाद-साधना, अद्वैत और सूफ़ी फ़ना — तीनों की एक ही ऊँचाई की बात करता है। यह कोई सामान्य कथन नहीं है, बल्कि अनुभूति से निकला हुआ वाक्य है।आपके कथन का आध्यात्मिक सार इस प्रकार खुलता है—“एक मत होकर नाद को लगातार महसूस करना”यह मन के विखंडन का अंत है।जब विचार, इच्छा, भय, स्मृति — सब एक ही धारा में विलीन हो जाते हैं, तब मन नहीं सुनता, बल्कि चेतना स्वयं नाद बन जाती है।“निर्लिप्त समाधि में लय हो जाना”यह सविकल्प से निर्विकल्प की यात्रा है।यहाँ साधक कर्ता नहीं रहता —न जप करने वाला,न ध्यान करने वाला,न अनुभव करने वाला।केवल होना शेष रहता है।यही वह बिंदु है जहाँगीता का “नैव किंचित्करोमीति”और सूफ़ी का “फ़ना फ़िल्लाह”एक ही सत्य बन जाते हैं।“वह मुकाम जो वर्षों की तपस्या से भी न मिले”यहाँ समय का नियम टूटता है।क्योंकि समय मन के लिए है,और नाद-लय में मन विलीन हो जाता है।इसलिए कई जन्मों की साधना का फलएक क्षण में उतर आता है।लेकिन — और यह अत्यंत महत्वपूर्ण हैयह साधक की योग्यता से नहीं, गुरु-कृपा से होता है।गुरु वह नहीं जो विधि बताए,गुरु वह है जो अपनी चेतना का स्पर्श दे दे।उस स्पर्श से साधक का भीतर का द्वार खुलता है,और नाद स्वयं पकड़ लेता है।कबीर इसी लिए कहते हैं—“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय”क्योंकि गुरु ही वह द्वार है जिससे गोविंद प्रकट होता है।अंत में एक सूक्ष्म सत्य—जिस साधक को यह अवस्था मिलती है,वह स्वयं कभी दावा नहीं करता।उसके भीतर केवल एक भाव रह जाता है“ना मैं साधक हूँ, ना सिद्ध — सब कुछ उसी की कृपा है।”नाद-साधना को सूफ़ी लतीफ़ों, वेदांत के ओंकार और योग के अनाहत नाद से जोड़कर और गहराई से खोल सकता हूँ।ठीक है — अब इसे और गहराई में, पर बिल्कुल सीधे अनुभव की भाषा में खोलते हैं।यह वही मार्ग है जहाँ सूफ़ी, वेदांत और योग तीनों मौन हो जाते हैं… और केवल नाद बोलता है। नाद क्या है — जिसे “सुना” नहीं जाता, जिसमें लय हुआ जाता हैनाद कोई ध्वनि नहीं है।ध्वनि बाहर से आती है — नाद भीतर से प्रकट होता है।वेदांत इसे अनाहत नाद कहता हैयोग इसे प्राण की सूक्ष्म गति कहता हैसूफ़ी इसे सौत-ए-हक़ (ईश्वर की पुकार) कहते हैंजब साधक “सुनने वाला” रहता है — तब तक द्वैत है।जब सुनने वाला ही गल जाता है, वही समाधि है।यही कारण है कि एकाग्रता नहीं, एकात्मता आवश्यक है।“एक मत होना” — साधना की असली कुंजी“एक मत” का अर्थ केवल मन को स्थिर करना नहीं है।इसका अर्थ है—इच्छा एकभय शून्यअहं विसर्जितश्रद्धा पूर्णजब साधक भीतर से कह देता है—“अब कुछ नहीं चाहिए, तू ही पर्याप्त है”उसी क्षण नाद स्वयं पकड़ लेता है।कबीर कहते हैं—“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं”सूफ़ी लतीफ़े और नाद का मिलनसूफ़ी मार्ग में छः लतीफ़े बताए गए हैं —लेकिन नाद-साधना में तीन निर्णायक हैं:लतीफ़ा-ए-क़ल्ब (हृदय)यहाँ नाद धड़कन जैसा नहीं,बल्कि मौन में कंपन बनता है।लतीफ़ा-ए-रूह (छाती के मध्य)यहाँ “मैं ध्यान कर रहा हूँ” टूटता है।नाद अब भीतर-भीतर फैलने लगता है।लतीफ़ा-ए-सिर्र (भौंहों के बीच से ऊपर)यहाँ नाद शब्द नहीं,बल्कि प्रकाश और मौन में बदल जाता है।यहीं सूफ़ी कहते हैं — फ़ना।ओंकार — नाद का वेदांतिक रहस्यॐकोई मंत्र नहीं है।यह सृष्टि की मूल कंपन अवस्था है।“अ” — जाग्रत“उ” — स्वप्न“म” — सुषुप्तउसके बाद जो मौन है — वही तुरीयनाद-साधना में साधकॐ का उच्चारण नहीं करता,वह ॐ में लय हो जाता है।क्यों वर्षों की तपस्या का फल क्षण में मिलता है?क्योंकि—तपस्या मन को शुद्ध करती हैनाद मन को मिटा देता हैमन के मिटते हीसंचित कर्म, संस्कार, समय —सब अर्थहीन हो जाते हैं।इसीलिए इसे कहते हैं—कृपा-मार्ग।गुरु-कृपा का असली स्वरूपगुरु कोई तकनीक नहीं देता।गुरु अपनी अवस्था का संकेत देता है।कभी—एक वाक्यएक दृष्टिएक स्पर्शया केवल मौनऔर भीतर का नाद जाग उठता है।इसीलिए कहा गया है—गुरु साधना नहीं सिखाता, गुरु साधक को मिटाता है।अंतिम सत्य (जिसे शब्द छू भी नहीं सकते)जिस दिन नाद स्थिर हो जाता है—साधक नहीं रहताअनुभव नहीं रहतासिद्धि नहीं रहतीकेवल यह भाव शेष रहता है—“जो है, वही मैं हूँ — और वही सब कुछ है

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