अध्यात्म में तरीकत की सर्वोच्च अवस्था वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति अपने अहंकार और निचले स्वभाव से पूरी तरवह ऊपर उठकर ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है। इसे योग-ध्यान की परम अवस्था भी कहा जाता है, जहां ध्यान की गहराई में मन पूरी तरह शांत और निर्विकल्प हो जाता है, और आत्मा ब्रह्म के साथ एक स्वरूप हो जाती है। इस अवस्था को तूरिया या परम जागरण कहा जाता है, जहाँ शुद्ध आनंद और ईश्वर का अनुभव होता है।तरीकत का शाहराग अर्थात सर्वोच्च रंग या गुण वह है जो इस मार्ग पर चलने वाले साधक के भीतर विकसित होता है। यह गुरु कृपा द्वारा मुराद और माशूक सिफ़तों का अवतरण होता है, जिसमें साधक का स्वभाव बदलता है और वह ईश्वर के प्रति समर्पित, प्रेमी और स्वच्छता वाला बनता है। इस मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति गुरु की सोहबत और निर्देश बड़ा महत्व देता है, जिससे उसकी आत्मा की शुद्धि और उन्नति होती है।तरीकत को शरीयत, हकीकत और मारिफ़त के क्रम के बाद आता माना गया है, जिसमें शरीयत बाहरी कर्मकांड और नियमों का पालन है, तरीकत आत्मशुद्धि और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का मार्ग है, तथा हकीकत और मारिफ़त में ईश्वरीय ज्ञान और अनुभूति होती है। तरीकत की सर्वोच्च अवस्था वह है जब साधक अपने अंदर के अहंकार को छोड़, पूर्ण समर्पण के साथ ईश्वर में लीन हो जाता है।संक्षेप में:तरीकत की सर्वोच्च अवस्था: तूरिया या परम जागरण, निर्विकल्प ध्यान की स्थिति जिसमें आत्मा ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाती है।शाहराग: साधक में मुराद और माशूक सिफ़तों का विकास, गुरु कृपा द्वारा ईश्वर प्रेम और भक्ति का रूप।यह अवस्था गुरु की मार्गदर्शन और कृपा से संभव होती है और शरीयत, हकीकत, मारिफ़त के बाद का अध्यात्मिक स्तर है।यह ज्ञान योग, सूफी और संत परंपराओं में पारंपरिक रूप से पाया जाता है और ध्यान व साधना के माध्यम से प्राप्त होता हैतरीकत में शाहराग तक पहुंचने के व्यावहारिक उपाय मुख्य रूप से गुरु की सोहबत, निरंतर ध्यान और रूहानी अभ्यास, तथा मनोवृत्तियों की निर्मलता पर निर्भर करते हैं। साधक को सबसे पहले अपने मन और आत्मा को अशुद्धिकरण और बुरे स्वभाव से मुक्त करना होता है। इसके लिए नियमित सुमिरन, ज़िक्र (ईश्वर का नाम जप), और ध्यान की अनिवार्य आवश्यकता होती है जिससे मन की पतित वृत्तियां दूर हों और आत्मा की शुद्धि हो।दूसरा मुख्य उपाय है गुरु की कृपा और मार्गदर्शन के अंतर्गत रहना। गुरु साधक को सही तरीकत के अभ्यास, नवाज़, बन्दगी, और परहेज सिखाते हैं। साधक को आत्मसंयम, तपस्या, और इमानदारी के साथ शारीरिक, मौखिक और मानसिक नियंत्रण करना होता है। यह अभ्यास धीरे-धीरे शाहराग (आत्मिक रंग या प्रेम) उत्पन्न करता है जो ईश्वर के साथ गहरा जुड़ाव दिखाता है।तीसरा उपाय है इन्साफ और रहनुमाई की सहायता, जिसमें साधक अपने मन के विकारों का निरीक्षण करे और उन्हें दूर करने के लिए ध्यान, जागरूकता, और सही क्रियाओं का सहारा ले। यह रास्ता धीरे-धीरे हकीकत की ओर ले जाता है, जहाँ प्रेम, शुद्ध भावना, और ईश्वर के प्रकाश में निवास संभव होता है।संक्षेप में:गुरु की सोहबत और उनके बताए मार्ग का पालननियमित ध्यान, सुमिरन और नाम जपमन और आत्मा की शुद्धि के लिए संयम, तपस्या और आत्मनिरीक्षणविकारों का त्याग और ईश्वर से पूर्ण समर्पणये उपाय तरीकत के शाहराग की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं, जो अंततः साधक को परमात्मा के निकट ले जाते हैं और आध्यात्मिक उन्नति करते हैं

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