अनाहद नाद आध्यात्मिक परंपराओं में वह दिव्य ध्वनि है जो बिना किसी बाहरी टकराव या बाजे के शरीर के अंदर गूंजती है, इसे आत्मा का संगीत या ब्रह्मांड की मूल ध्वनि माना जाता है। यह ध्यान की गहन अवस्था में अनुभव होती है और साधक को परमात्मा से जोड़ती है, मन की शुद्धि और एकाग्रता प्रदान करती है। संत कबीर, गुरु नानक जैसे भक्तों ने इसे आत्मज्ञान का द्वार कहा है।अनाहद नाद का मूल अर्थअनाहद शब्द संस्कृत से आया है, जहां ‘अनाहद’ का अर्थ है बिना घात या टकराहट के, और ‘नाद’ ध्वनि। यह वह सूक्ष्म स्वर है जो शून्य अवस्था से उत्पन्न होता है, जैसे घंटी, शंख, बांसुरी या गरज की आवाजें, जो साधना से क्रमशः प्रकट होती हैं । योग शास्त्रों में इसे नादानुसंधान कहा गया, जो मन को लयबद्ध कर जीवात्मा को परमात्मा से एकाकार करता है ।आध्यात्मिक महत्वसंतमत में अनाहद नाद आत्मा का बाजा है, जो कुंडलिनी जागरण और सहज समाधि का संकेत है, सृष्टि के सृजन-क्षय का प्रतीक। इसे सुनने से नाड़ी तंत्र शुद्ध होता है, विचार पवित्र और आनंद प्राप्ति होती है, ईश्वर की निकटता अनुभव होती है । यह बिना गुरु कृपा के नहीं जाना जाता, और इसे आत्मा में बसा लेना संतत्व की निशानी है ।साधना में भूमिकागहन ध्यान, नाम जप और श्वास नियंत्रण से दाहिने कान से इसे सुना जाता है, जो सुरत को ऊर्ध्व ले जाता है। दस प्रकार की ध्वनियां (चिनचिन से गरज तक) क्रम से अनुभव होती हैं, जो ब्रह्म पथ की यात्रा दर्शाती हैं । वासनाओं के बिना ही इसका सच्चा अनुभव संभव है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता हैअनाहद नाद को आध्यात्मिक परंपराओं में आत्मा का बाजा या दिव्य संगीत कहा जाता है, जो बिना किसी बाहरी टकराहट के शरीर के भीतर स्वतः गूंजता है। इसे जान लेने और आत्मा में स्थापित कर लेने वाला साधक ही सच्चा संत बनता है, क्योंकि यह परमात्मा से एकाकार होने का प्रतीक है।अनाहद नाद का अर्थअनाहद नाद वह सूक्ष्म ध्वनि है जो ध्यान की गहन अवस्था में सुनाई देती है, जैसे घंटी, बांसुरी या ओमकार की गूंज। कबीर और नानक जैसे संतों ने इसे आत्मा का संगीत माना है, जो अहंकार नष्ट कर शांति प्रदान करता है

। यह बिना बजाए बजने वाली ध्वनि है, जो साधना से आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है
।संतमत में महत्वसंत परंपरा में अनाहद नाद को आत्मा का बाजा कहकर गुरु नानक ने वर्णन किया कि इसे सुनने वाला परमानंद प्राप्त करता है और सतलोक तक पहुंचता है
। इसे आत्मा में बसा लेना संतत्व की पहचान है, क्योंकि यह बाहरी भक्ति से ऊपर आंतरिक जागरण है ।इसे सुनने की साधनागहन ध्यान, नाम सिमरन और शब्द योग से अनाहद नाद अनुभव होता है, जो सुरत को ऊर्ध्व दिशा में ले जाता है। समर्थगुरु जैसे आचार्यों के अनुसार, यह आत्मा की आवाज है जो ब्रह्म का स्वरूप है
। इसे जानकर स्थापित करने वाला लकवा मार गया सांसारिक मोह से, वही संत हैअनाहद नाद और कुंडलिनी का गहरा आध्यात्मिक संबंध है, जहां कुंडलिनी शक्ति का जागरण अनाहद नाद के अनुभव का आधार बनता है। कुंडलिनी मूलाधार चक्र से जागृत होकर ऊर्ध्व यात्रा करती है, जिससे नाद योग की ध्वनियां प्रकट होती हैं। यह संबंध आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
कुंडलिनी का जागरणकुंडलिनी शक्ति सुप्त अवस्था में मूलाधार में रहती है, ध्यान, मंत्र जप और गुरु कृपा से जागृत होकर सहस्रार तक पहुंचती है। इस प्रक्रिया में चक्र खुलते हैं, जो अनाहद नाद की विभिन्न ध्वनियां (चीनी, बांसुरी, गरज आदि) उत्पन्न करते हैं
यह ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी से गुजरती है, जिसे ब्रह्मनाड़ी भी कहते हैं।नाद अनुभव का आधारकुंडलिनी जागरण ही अनाहद नाद सुनने का प्रमुख कारक है, क्योंकि यह चेतना को उच्च स्तर पर ले जाता है। बिना जागरण के यह ध्वनि बाहरी इंद्रियों से नहीं पकड़ी जा सकती, बल्कि आंतरिक जागरूकता से अनुभव होती है
। संत परंपरा में इसे नादानुसंधान कहा गया, जो मोह-माया से मुक्ति देता है।आध्यात्मिक परिणामइस संबंध से साधक को आत्मा-परमात्मा का मिलन, ब्रह्मज्ञान और समाधि प्राप्ति होती है। कुछ मतों में इन्हें चित्त चमत्कार माना, परंतु योगमार्ग में यह सिद्धि का प्रतीक है
वासनाशून्य मन ही इसे स्थापित कर संत बनाता है।

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