। यह बिना बजाए बजने वाली ध्वनि है, जो साधना से आत्मा को परमात्मा से जोड़ती है
।संतमत में महत्वसंत परंपरा में अनाहद नाद को आत्मा का बाजा कहकर गुरु नानक ने वर्णन किया कि इसे सुनने वाला परमानंद प्राप्त करता है और सतलोक तक पहुंचता है
। इसे आत्मा में बसा लेना संतत्व की पहचान है, क्योंकि यह बाहरी भक्ति से ऊपर आंतरिक जागरण है ।इसे सुनने की साधनागहन ध्यान, नाम सिमरन और शब्द योग से अनाहद नाद अनुभव होता है, जो सुरत को ऊर्ध्व दिशा में ले जाता है। समर्थगुरु जैसे आचार्यों के अनुसार, यह आत्मा की आवाज है जो ब्रह्म का स्वरूप है
। इसे जानकर स्थापित करने वाला लकवा मार गया सांसारिक मोह से, वही संत हैअनाहद नाद और कुंडलिनी का गहरा आध्यात्मिक संबंध है, जहां कुंडलिनी शक्ति का जागरण अनाहद नाद के अनुभव का आधार बनता है। कुंडलिनी मूलाधार चक्र से जागृत होकर ऊर्ध्व यात्रा करती है, जिससे नाद योग की ध्वनियां प्रकट होती हैं। यह संबंध आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है।
कुंडलिनी का जागरणकुंडलिनी शक्ति सुप्त अवस्था में मूलाधार में रहती है, ध्यान, मंत्र जप और गुरु कृपा से जागृत होकर सहस्रार तक पहुंचती है। इस प्रक्रिया में चक्र खुलते हैं, जो अनाहद नाद की विभिन्न ध्वनियां (चीनी, बांसुरी, गरज आदि) उत्पन्न करते हैं
यह ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी से गुजरती है, जिसे ब्रह्मनाड़ी भी कहते हैं।नाद अनुभव का आधारकुंडलिनी जागरण ही अनाहद नाद सुनने का प्रमुख कारक है, क्योंकि यह चेतना को उच्च स्तर पर ले जाता है। बिना जागरण के यह ध्वनि बाहरी इंद्रियों से नहीं पकड़ी जा सकती, बल्कि आंतरिक जागरूकता से अनुभव होती है
। संत परंपरा में इसे नादानुसंधान कहा गया, जो मोह-माया से मुक्ति देता है।आध्यात्मिक परिणामइस संबंध से साधक को आत्मा-परमात्मा का मिलन, ब्रह्मज्ञान और समाधि प्राप्ति होती है। कुछ मतों में इन्हें चित्त चमत्कार माना, परंतु योगमार्ग में यह सिद्धि का प्रतीक है
वासनाशून्य मन ही इसे स्थापित कर संत बनाता है।