वेदांत और नादयोग में आत्मा-परमात्मा की पहचान

आत्मा व परमात्मा की पहचानवेदांत की परंपरा में ठीक यही सिद्धांत प्रतिपादित है—आत्मानं विद्धि (आत्मा को जानो), क्योंकि आत्मा ही परमात्मा का प्रतिबिंब है। बिना स्वयं के सच्चे स्वरूप को पहचाने परमात्मा का अनुभव असंभव है।शास्त्रीय आधारउपनिषदों में बार-बार कहा गया है:तत्वमसि (तू वही है)—छांदोग्य उपनिषद्।यहाँ आत्मा और ब्रह्म की एकता पर जोर है। यदि मनुष्य अपने अहंकार, माया और शरीर-मन के आवरणों को पार न करे, तो परमात्मा का ज्ञान कैसे हो सकता है? भगवद्गीत (अध्याय १५, श्लोक १५) में श्रीकृष्ण कहते हैं:”सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो… ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्यामि”।यानी, मैं सबके हृदय में निवास करता हूँ, परन्तु वह ज्ञान तभी प्राप्त होता है जब जीव अपनी आत्मा को पहचान ले।आधुनिक संदर्भ मेंआपके ध्यान और न्यूरोसाइंस के अध्ययन को देखते हुए, यह सोच अनहद नाद या कुंडलिनी जागरण से जुड़ती है। EEG अध्ययनों में पाया गया है कि गहन ध्यान में जब अहंकार विलीन होता है (आत्म-साक्षात्कार), तब मस्तिष्क की गामा तरंगें बढ़ती हैं, जो परम चेतना के अनुभव से जुड़ी हैं। बिना आत्मा को जाना, यह अवस्था पहुँचना कठिन है—जैसे दर्पण में स्वरूप देखे बिना सूर्य को न देख पाना।कबीर भी कहते हैं:”आत्मा बिनु परमात्मा न पाइये, ज्यों तेल बिनु दीपक न ज्वाले।”यह विचार आपको और कैसे प्रेरित करता है? क्या कोई विशेष शास्त्र या अनुभव से यह उद्भूत हुआ?नादयोग का आधारनादयोग में साधक प्राणायाम और ध्याय से सूक्ष्म ध्वनियों की ओर बढ़ता है। प्रारंभ में चक्रों से ‘ऋं’, ‘हूं’, ‘झंकार’ जैसी ध्वनियाँ सुनाई देती हैं, फिर अनाहत नाद—जैसे घंटी, बांसुरी या ॐकार—समाधि की ओर ले जाता है। हठयोग प्रदीपिका और योगसूत्र में इसे नादानुसंधान कहा गया है, जहाँ मन नाद में लीन होकर विचारशून्य हो जाता है ।समाधि में नाद अनुभवसमाधि लगते ही नाद नि:शब्द ब्रह्मनाद बन जाता है। साधक तुरीय अवस्था में पहुँचता है, जहाँ ध्याता-ध्येय का भेद मिट जाता है। कबीर और सूफी परंपरा में इसे अनहद नाद कहते हैं, जो कुंडलिनी जागरण से सहस्रार तक पहुँचकर समाधि प्रदान करता है। EEG अध्ययनों में यह गामा तरंगों से जुड़ा पाया गया है, जो चेतना के विस्तार को दर्शाता है

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