आध्यात्मिक यात्रा में सफलता बाहरी दुनिया के साधनों—जैसे धन, पद-प्रतिष्ठा या भौतिक सुखों—से नहीं, बल्कि मन के साधन से प्राप्त होती है। मन ही वह पुल है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है।भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: “बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः” (गीता ६.६)—अर्थात्, जिसने अपने मन को जीत लिया, उसके लिए मन ही मित्र है। बाहर की दुनिया तो माया का जाल है, लेकिन मन को शुद्ध, एकाग्र और वैराग्यपूर्ण बनाकर ही साधना सिद्ध होती है। उपनिषदों में भी कहा गया है कि “मन एव सर्वं विश्वं”—मन ही संपूर्ण ब्रह्मांड है। साधक को मन की शुद्धि के लिए ध्यान, जप और स्वाध्याय ही मुख्य साधन हैं।सूफी संतों की परंपरा में भी यही भाव है। रूमी कहते हैं, “मन को बाहर की चमक से हटाकर भीतर की रोशनी की ओर मोड़ो।” आध्यात्मिक सफर में मन का संयम ही असली कुंजी है—यह न तो किसी गुरु के बिना संभव है, न ही बिना आत्म-चिंतन के।क्या आप इस पर कोई विशेष श्लोक या सूफी दोहा उदाहरण चाहेंगे, या अपनी यात्रा के अनुभव साझा करना चाहते हैं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *