इंसान का ग्रहस्थ जीवन के कर्तेव्य ओर गुरु के प्रति आस्था मंजिल।पाने के लिए त्याग समर्पण और सहनशीलता विनम्रता ओर घर के करतेवयो के बीच नैया भंवर में फस जाती है विरला ही भंवर से निकलता हैमेरे द्वारा गृहस्थ-जीवन की सबसे कठिन सच्चाई को एक ही वाक्य में रख दिया है। वहः है सन्यासी या गृहस्थ धर्म को निभाना मैं जानता हूं मेरे लिऐ पहले गृहस्त जीवन है जिसे मैंने पालने का वचन पत्नी को दिया है और वहः गृहस्थ धर्म को निभाती हुई कतर्व्य पालन करती है और जीवन साथी बन कर घर के बोझ को उठती है पर मानव चाशे पुरुष हो या महिला सब जीवन से मुक्त होना चाहते इसीलिए कोई न कोई धर्म पालन कर उस रास्ते पर चलते है कुछ लोग आध्यत्मिकता जिसमे प्रेम भक्ति ज्ञान और समाधि को कर्म के अनुसार अपना बना लेते है और शिक्षक के रूप में माता पिता या गुरु को बना कर ईश्वर तुल्य मॉन उ नको अनुसरण करना शुरू कर देते है इसमें अपने गृहस्थ कर्म को कम।प्रधनता देते है और अध्यात्मकता कि ओर झुक अपने नैतिक।कर्म भूल।जाते है यहां पर गृहस्थ ओर आध्यत्मिक कर्म बराबर मायने रखते है एक को भी कम या छोड़ना अकर्म बन दोषी बना देता हैगृहस्थ के कर्तव्यऔर गुरु के प्रति आस्था —ये दो किनारे हैं,और बीच में जीवन की नैया है।त्याग, समर्पण, सहनशीलता, विनम्रताये पतवार हैं,पर लहरें इतनी प्रबल होती हैं किनैया अक्सर भँवर में फँस जाती है।भँवर क्या है?भँवर गृहस्थी नहीं है,भँवर है —अपेक्षाएँस्वामित्व का भाव“मेरा–तेरा”और भीतर छुपा हुआ अहंकारगृहस्थी तो स्वयं एक साधना-क्षेत्र है,पर जब उसे बंधन समझ लिया जाता हैतो वही साधना भँवर बन जाती है।गुरु-आस्था और कर्तव्य का संतुलनगुरु कभी यह नहीं कहते किघर छोड़ दो,कर्तव्य त्याग दो।सच्चा गुरु कहता है —घर में रहो, पर घर के मत हो जाओ।जो यह कला सीख लेता है,वही भँवर से निकलता है।“विरला ही निकलता है” — क्यों?क्योंकि अधिकतर लोग —या तो कर्तव्य में डूब जाते हैंया वैराग्य का नाटक करते हैंविरला वह है जो —बाहर से पूरी ज़िम्मेदारी निभाता हैभीतर से केवल ईश्वर पर टिका रहता हैयही गीता का कर्मयोग,यही सूफ़ियों का फ़ना-फिल-अमल,और यही वेदांत का साक्षी-भाव है।एक गुप्त सत्यजिसे भँवर दिखाई देने लगा है,वह डूब नहीं रहा —वह जाग रहा है।डूबता वह हैजो भँवर को ही समुद्र मान ले।आपकी बात में शिकायत नहीं,अनुभव की सच्चाई है।और ऐसे अनुभव से हीवह विरला जन्म लेता हैजो पार उतरता है।

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