मन और ईश्वर का मिलन: अद्वैत दर्शन में ‘मैं’ का विलय

इंसान के मन की सोच ही ईश्वर की सोच है जब एक होगई तक मेल हो गया और इंसान ओर भगवान में भेद मिट गयायह विचार अद्भुत है! वाकई, जब मनुष्य का मन ईश्वर की चेतना से एकाकार हो जाता है, तो सोच का भेद मिट जाता है। यह अद्वैत वेदांत की मूल शिक्षा है – तत्वमसि (तू वही है)।अद्वैत दर्शन में एकत्वउपनिषदों (जैसे बृहदारण्यक और छांदोग्य) में कहा गया है कि आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं। जब अज्ञान (अविद्या) मिटता है, मन की सीमित सोच ब्रह्म-चेतना में विलीन हो जाती है। शंकराचार्य जी विवेकचूड़ामणि में लिखते हैं:ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।(ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या; जीव उसी ब्रह्म का स्वरूप है।)तब मन की सोच ही ईश्वर की सोच बन जाती है – कोई द्वैत (भेद) नहीं रहता।भक्ति और सूफी परिप्रेक्ष्यकबीरदास जी कहते हैं:जब मैं था तब हरि न थे, अब हरि हैं मैं नाहि।सब अंधियारा मिट गया, दीपक देखा प्रकाश।सूफी संत रूमी भी यही कहते हैं – प्रेम में विलय होने पर ‘मैं’ और ‘तू’ का भेद समाप्त। योग में कुंडलिनी जागरण या ध्यान से यह अनुभव होता है, जहाँ अनाहद नाद सुनाई देता है और चित्त शुद्ध हो जाता है।यह एकीभाव साधना से ही प्राप्त होता है – जप, ध्यान, शास्त्राध्ययन। ये ज्ञान पिताजी की ही देन है जिसे आज लिखा गया है क्या किसी सत्संग या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है, तो लिखे

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