इबादत में बेख़ुदी और महाशून्य का संबंध बहुत गहरा है। सूफ़ी मत की बेख़ुदी (फ़ना) और योग की महाशून्य अवस्था लगभग एक ही आध्यात्मिक अनुभव के दो अलग नाम माने जा सकते हैं। बेख़ुदी क्या करती है? जब इबादत या ध्यान में बेख़ुदी आती है तो – “मैं” का भाव मिटने लगता है शरीर का एहसास कम हो जाता है विचार रुकने लगते हैं अंदर शांति और खालीपन महसूस होता है यही खालीपन आगे चलकर शून्य बनता है। शून्य से महाशून्य की यात्रा आपने पहले जो कहा था कि अनाहद से शून्य और फिर महाशून्य, वह गहरी साधना की परंपरा है: इबादत → बेख़ुदी → शून्य → महाशून्य बेख़ुदी = खुद को भूलना शून्य = मन का शांत हो जाना महाशून्य = अस्तित्व का लय हो जाना इस अवस्था की पहचान जब बेख़ुदी महाशून्य की तरफ जाती है तो: भीतर गहरी शांति रहती है दुनिया से मोह कम हो जाता है अकेले रहने में आनंद आता है कभी-कभी अनाहद नाद सुनाई देता है दिल में बस एक ही याद रहती है – मालिक की सबसे ऊँची बेख़ुदी सबसे ऊँची बेख़ुदी वह है: जिसमें साधक खो जाता है साधना भी भूल जाती है बस अस्तित्व रह जाता है सूफ़ी लोग इसे फना-फिल्लाह कहते हैं और योग में इसे निर्विकल्प समाधि या महाशून्य कहा जाता है। असल में — “इबादत की शुरुआत याद से होती है, और अंत बेख़ुदी में होता है।” अगर आप चाहें तो मैं इबादत की बेख़ुदी और कामिल गुरु की तवज्जुह का संबंध भी समझा सकता हूँ — यह बहुत गहरा सूफ़ी रहस्य है जो साधक को गुरु ही बता सकता हैइबादत में बेख़ुदी का मतलब है – ऐसी उपासना या बंदगी जिसमें इंसान अपनी मैं (अहंकार) को भूल जाए और सिर्फ़ मालिक की याद में डूब जाए। यह सूफ़ी और योग दोनों परंपराओं में एक ऊँची आध्यात्मिक अवस्था मानी जाती है। इबादत में बेख़ुदी का अर्थ अपने आप को भूल जाना दिल का पूरी तरह रब में लग जाना न दुनिया का ख्याल, न शरीर का अहसास सिर्फ़ उसकी याद और उसका नूर सूफ़ी लोग कहते हैं: “जब बंदा खुद को भूल जाता है, तब वह खुदा को पा लेता है।” आध्यात्मिक दृष्टि से इबादत की अवस्थाएँ कुछ इस तरह समझी जाती हैं: ज़ाहिरी इबादत – नमाज़, जप, पूजा (शरीर से) दिल की इबादत – ध्यान और प्रेम (दिल से) बेख़ुदी की इबादत – फना की हालत (अस्तित्व मिटना) इस अवस्था में: समय का पता नहीं चलता मन शांत हो जाता है भीतर अनहद या शून्यता का अनुभव हो सकता है यह वही अवस्था है जिसे योग में समाधि, और सूफ़ी मत में फ़ना कहा जाता है।

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