इबादत वह मार्ग है जहाँनियम हैअनुशासन हैविधि है“मैं करता हूँ” की भावना हैनमाज़, पूजा, जप, व्रत, ध्यान — ये सब इबादत हैं।यह साधक को शुद्ध करती है, मन को एकाग्र बनाती है।लेकिन इबादत में अभी दूरी रहती है —बंदा अलग है, मालिक अलग है।इश्क़ क्या है?इश्क़ वह अवस्था है जहाँनियम अपने आप गिर जाते हैंविधि पीछे छूट जाती हैकरने वाला मिटने लगता हैयहाँ कोई “मैं” नहीं रहता —सिर्फ़ वह रहता है।सूफ़ी कहते हैं:“इबादत में मैं हूँ,इश्क़ में मैं नहीं हूँ।”सूफ़ी दृष्टिसूफ़ी परंपरा में कहा गया:इबादत → रास्ताइश्क़ → मंज़िलरूमी कहते हैं:“जब इश्क़ आ जाता है,तो सजदा खुद झुक जाता है।”बुल्ले शाह कहते हैं:“मस्जिद ढहा दे, मंदिर ढहा दे,ढाह दे जो कुछ ढहंदा —पर किसी का दिल न ढाह्वी,रब दिलां विच रहंदा।”भक्ति परंपरा मेंमीरा, राधा, चैतन्य महाप्रभु —इन्होंने इबादत नहीं छोड़ी,बल्कि इबादत को इश्क़ बना दिया।राधा की भक्ति में कृष्ण भगवान नहीं,प्रेमी हैं।अद्वैत की दृष्टिअद्वैत कहता है:इबादत → द्वैत की साधनाइश्क़ → अद्वैत का विस्फोटजब प्रेम पूर्ण होता है तो ज्ञात होता है:जिसे खोज रहा था, वही मैं था।यहाँ न इबादत बचती है,न इश्क़ —सिर्फ़ सत्य बचता है।निष्कर्षइबादत बिना इश्क़ के → बोझइश्क़ बिना इबादत के → पागलपनदोनों साथ हों → इंसान खुद रब की खुशबू बन जाता है

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