ईश्वर से मिलाने वाली साधना एक ही है — भक्ति,और भक्ति का प्राण है दिल से किया गया समर्पणयुक्त इल्म (ज्ञान)।यहाँ इल्म केवल पढ़ा-सुना ज्ञान नहीं है, बल्किवह अनुभूत सत्य है जो हृदय को झुका देता है, अहंकार को गलाता है और“मैं” को “तू ही” में विलीन कर देता है।बिना समर्पण का ज्ञान शुष्क तर्क बन जाता है।बिना ज्ञान की भक्ति भावुकता बनकर भटक सकती है।लेकिन जब ज्ञान भक्ति में डूब जाए औरभक्ति ज्ञान से प्रकाशित हो,तभी वही साधना ईश्वर से मिला देती है।सूफ़ी इसे कहते हैं इल्म-ए-हाज़िर,वेदांत इसे कहता है अपरोक्ष अनुभूति,और गीता में कृष्ण कहते हैं —“भक्त्या मामभिजानाति” — मुझे भक्ति से ही जाना जा सकता है।जहाँ दिल झुक गया,वहाँ साधना पूरी हुई।वहाँ ईश्वर दूर नहीं रहता —वहीं प्रकट हो जाता है। 🙏

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