कर्मयोग को श्रीकृष्ण यो मूल श्लोकभगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 47 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ इसका हिंदी अर्थ है: तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कभी भी कर्मफल के हेतु मत बनो और न ही कर्म न करने में आसक्त हो। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि कर्म करना अनिवार्य है, पर फल की इच्छा या आसक्ति त्यागनी चाहिए, जो आपके विचार से पूर्णतः मेल खाता है। ईश्वर-स्मरण का उपदेशअध्याय 12, श्लोक 8 में कहा गया: मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ अर्थ: अपने मन को केवल मुझमें ही लगाओ, अपनी बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो। इस प्रकार तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं। यह भक्ति का सार है, जो सतत इष्ट-स्मरण की शिक्षा देता है, जिससे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। भक्ति का चरम संदेशअध्याय 18, श्लोक 66: सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो। यह गीता का अंतिम उपदेश है, जो कर्म के साथ पूर्ण समर्पण और स्मरण पर जोर देता है। जन्म, मरण, काल और स्थान जैसा सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है, जबकि इंसान को कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन कर्म के फल की प्राप्ति इसी जन्म में होना निश्चित नहीं होता। इसी लिए सतत अपने इष्ट (ईश्वर, गुरु या किसी आध्यात्मिक आकांक्षा) को याद रखना आवश्यक रहता है।यह दृष्टिकोण भगवद् गीता के उपदेशों से मेल खाता है, जिसमें कहा गया है कि कर्म करो पर फल की इच्छा त्याग दो। कर्म करना हमारा धर्म है, पर फल ईश्वर की मर्जी पर निर्भर है। इस स्थिति में:सतत ईश्वर-स्मरण से मन शांत रहता है और कर्म भी बिना आसक्ति के होता है।फल की चिंता न करके कर्म में निरन्तरता बनी रहती है।ईश्वर का उस्मरण भक्त को मोहमाया से ऊपर उठने में मदद करता है।इसी भक्ति और स्मृति के बल पर जीवन का उद्देश्य सिद्ध होता है।आपके विचार में यह भी सशक्त संदेश है कि फल का स्वामी ईश्वर है, इसलिए मनुष्य को कर्म करते हुए अपने इष्ट का स्मरण करना चाहिए। यह याद दिलाता है कि आध्यात्मिक साधना और कर्म दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।
HomeVachanकर्मयोग को श्रीकृष्ण यो मूल श्लोकभगवद्गीता के अध्याय 2, श्लोक 47 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ इसका हिंदी अर्थ है: तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कभी भी कर्मफल के हेतु मत बनो और न ही कर्म न करने में आसक्त हो। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि कर्म करना अनिवार्य है, पर फल की इच्छा या आसक्ति त्यागनी चाहिए, जो आपके विचार से पूर्णतः मेल खाता है। ईश्वर-स्मरण का उपदेशअध्याय 12, श्लोक 8 में कहा गया: मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ अर्थ: अपने मन को केवल मुझमें ही लगाओ, अपनी बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो। इस प्रकार तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं। यह भक्ति का सार है, जो सतत इष्ट-स्मरण की शिक्षा देता है, जिससे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। भक्ति का चरम संदेशअध्याय 18, श्लोक 66: सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो। यह गीता का अंतिम उपदेश है, जो कर्म के साथ पूर्ण समर्पण और स्मरण पर जोर देता है। जन्म, मरण, काल और स्थान जैसा सब कुछ ईश्वर के नियंत्रण में है, जबकि इंसान को कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन कर्म के फल की प्राप्ति इसी जन्म में होना निश्चित नहीं होता। इसी लिए सतत अपने इष्ट (ईश्वर, गुरु या किसी आध्यात्मिक आकांक्षा) को याद रखना आवश्यक रहता है।यह दृष्टिकोण भगवद् गीता के उपदेशों से मेल खाता है, जिसमें कहा गया है कि कर्म करो पर फल की इच्छा त्याग दो। कर्म करना हमारा धर्म है, पर फल ईश्वर की मर्जी पर निर्भर है। इस स्थिति में:सतत ईश्वर-स्मरण से मन शांत रहता है और कर्म भी बिना आसक्ति के होता है।फल की चिंता न करके कर्म में निरन्तरता बनी रहती है।ईश्वर का उस्मरण भक्त को मोहमाया से ऊपर उठने में मदद करता है।इसी भक्ति और स्मृति के बल पर जीवन का उद्देश्य सिद्ध होता है।आपके विचार में यह भी सशक्त संदेश है कि फल का स्वामी ईश्वर है, इसलिए मनुष्य को कर्म करते हुए अपने इष्ट का स्मरण करना चाहिए। यह याद दिलाता है कि आध्यात्मिक साधना और कर्म दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।