कर्म के अनुसार जन्म और कर्म करने को स्वतंत्र फिर भी हमारी इचछाये असीमित है हम परमात्मा से मांगते है और हमारी भावनाएं ब्रह्मण्ड में परमात्मा के पास घूमती रहती है पर कर्मो के अनुसार ही भाग्य में लिखी यानी उस परमात्मा की चाह से ही सम्पन्न होती है जिसके लिए जन्म और कर्म जिम्मेदार हैआपने कर्म–भाग्य–ईच्छा–परमात्मा के सम्बन्ध को बहुत सूक्ष्म रूप में कह दिया है।इसे अगर थोड़ा स्पष्ट क्रम में रखें तो वेदांत और गीता दोनों की बात एक साथ खुलती है।कर्म के अनुसार जन्मजीव जिस संस्कार–पुंज को लेकर आता है वही उसका प्रारब्ध बनता है।इससे शरीर, परिस्थितियाँ, परिवार, सुख-दुःख तय होते हैं।यहाँ स्वतंत्रता नहीं होती — यह भोग है।कर्म करने की स्वतंत्रताजन्म के बाद मनुष्य को विवेक दिया गया।यही पुरुषार्थ है।गीता कहती है —“कर्मण्येवाधिकारस्ते”अर्थात कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं।इच्छाएँ क्यों असीमित हैं?क्योंकि इच्छा मन से उठती है और मन का स्वभाव ही अपूर्णता से भागना है।मन बाहर खोजता है, आत्मा भीतर पूर्ण है।इसी टकराव से अनंत इच्छाएँ पैदा होती हैं।भावनाएँ ब्रह्माण्ड में घूमती हैं — यह कैसे?हर इच्छा एक संस्कारिक तरंग है।वह ब्रह्माण्ड में नहीं भटकती —वह उसी चेतना में उठती है जिसमें ब्रह्माण्ड उठा है।परमात्मा से अलग कोई स्थान है ही नहीं।फिर सब कुछ परमात्मा की इच्छा से ही क्यों होता है?क्योंकि —कर्म बीज हैइच्छा जल हैऔर फल परमात्मा का विधानजो कर्म-संस्कार के अनुकूल है वही घटित होता है।बाकी इच्छा तपकर संस्कार बनती है और अगले कर्म या जन्म का कारण बनती है।सबसे गहरा सत्यजब साधक यह देख लेता है कि“मेरी इच्छा भी उसी की दी हुई है”तो मांग खत्म हो जाती है।यहीं से भोग से योग शुरू होता है।यहीं कर्म बंधन नहीं रहता, साधना बन जाता है।अंत में एक वाक्य में सार —मन मांगता है, कर्म तय करता है,परमात्मा घटाता है,और ज्ञानी स्वीकार करता है।गीता + अद्वैत + सूफ़ी फ़ना–बक़ा के संगम से खोलते हैं। एकमात्र सत्य-सूत्र“कर्म चलता है अहंकार से,इच्छा उठती है मन से,घटना होती है ईश्वर से,और मुक्ति होती है समर्पण से।”** गीता का रहस्यकर्म + विवेक + समर्पणश्रीकृष्ण कहते हैं —निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्अर्थात —तू कर्ता मत बन, उपकरण बन।यहाँ कर्म होता है,पर “मैं कर रहा हूँ” टूट जाता है।यही कर्मयोग है।अद्वैत का उद्घाटनकर्तापन का भ्रमअद्वैत कहता है —कर्ता भी ब्रह्म हैकर्म भी ब्रह्म हैफल भी ब्रह्म हैजब यह दिख जाता है, तब“मेरी इच्छा”“मेरा भाग्य”दोनों मिथ्या हो जाते हैं।यही अहंकार की मृत्यु है।सूफ़ी फ़ना–बक़ा का अनुभवइच्छा का लोप → ईश्वर की चाहफ़ना = अपनी चाह का गलनाबक़ा = उसी की चाह में जीवित रहनासूफ़ी कहते हैं —जो तू चाहता है, वो तू नहीं है;जो उससे चाहता है, वही तू है।यहाँ “मांग” नहीं रहती,रज़ा (ईश्वर की मर्ज़ी) रह जाती है।सबसे गहरी बात (गुप्त रहस्य)जब साधक देख लेता है कि —इच्छा भी उसकी दी हुई है,तो मांग किससे?यहीं कर्म बंधन नहीं बनता।यहीं प्रारब्ध भी जलने लगता है।निष्कर्ष (तीनों का एक स्वर)कर्म करो — पर कर्ता मत बनोइच्छा उठे — पर मालिक मत बनोजो मिले — उसे उसकी रज़ा समझोयही गीता है।यही अद्वैत है।यही सूफ़ी फ़ना–बक़ा है।
HomeVachanकर्म के अनुसार जन्म और कर्म करने को स्वतंत्र फिर भी हमारी इचछाये असीमित है हम परमात्मा से मांगते है और हमारी भावनाएं ब्रह्मण्ड में परमात्मा के पास घूमती रहती है पर कर्मो के अनुसार ही भाग्य में लिखी यानी उस परमात्मा की चाह से ही सम्पन्न होती है जिसके लिए जन्म और कर्म जिम्मेदार हैआपने कर्म–भाग्य–ईच्छा–परमात्मा के सम्बन्ध को बहुत सूक्ष्म रूप में कह दिया है।इसे अगर थोड़ा स्पष्ट क्रम में रखें तो वेदांत और गीता दोनों की बात एक साथ खुलती है।कर्म के अनुसार जन्मजीव जिस संस्कार–पुंज को लेकर आता है वही उसका प्रारब्ध बनता है।इससे शरीर, परिस्थितियाँ, परिवार, सुख-दुःख तय होते हैं।यहाँ स्वतंत्रता नहीं होती — यह भोग है।कर्म करने की स्वतंत्रताजन्म के बाद मनुष्य को विवेक दिया गया।यही पुरुषार्थ है।गीता कहती है —“कर्मण्येवाधिकारस्ते”अर्थात कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं।इच्छाएँ क्यों असीमित हैं?क्योंकि इच्छा मन से उठती है और मन का स्वभाव ही अपूर्णता से भागना है।मन बाहर खोजता है, आत्मा भीतर पूर्ण है।इसी टकराव से अनंत इच्छाएँ पैदा होती हैं।भावनाएँ ब्रह्माण्ड में घूमती हैं — यह कैसे?हर इच्छा एक संस्कारिक तरंग है।वह ब्रह्माण्ड में नहीं भटकती —वह उसी चेतना में उठती है जिसमें ब्रह्माण्ड उठा है।परमात्मा से अलग कोई स्थान है ही नहीं।फिर सब कुछ परमात्मा की इच्छा से ही क्यों होता है?क्योंकि —कर्म बीज हैइच्छा जल हैऔर फल परमात्मा का विधानजो कर्म-संस्कार के अनुकूल है वही घटित होता है।बाकी इच्छा तपकर संस्कार बनती है और अगले कर्म या जन्म का कारण बनती है।सबसे गहरा सत्यजब साधक यह देख लेता है कि“मेरी इच्छा भी उसी की दी हुई है”तो मांग खत्म हो जाती है।यहीं से भोग से योग शुरू होता है।यहीं कर्म बंधन नहीं रहता, साधना बन जाता है।अंत में एक वाक्य में सार —मन मांगता है, कर्म तय करता है,परमात्मा घटाता है,और ज्ञानी स्वीकार करता है।गीता + अद्वैत + सूफ़ी फ़ना–बक़ा के संगम से खोलते हैं। एकमात्र सत्य-सूत्र“कर्म चलता है अहंकार से,इच्छा उठती है मन से,घटना होती है ईश्वर से,और मुक्ति होती है समर्पण से।”** गीता का रहस्यकर्म + विवेक + समर्पणश्रीकृष्ण कहते हैं —निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्अर्थात —तू कर्ता मत बन, उपकरण बन।यहाँ कर्म होता है,पर “मैं कर रहा हूँ” टूट जाता है।यही कर्मयोग है।अद्वैत का उद्घाटनकर्तापन का भ्रमअद्वैत कहता है —कर्ता भी ब्रह्म हैकर्म भी ब्रह्म हैफल भी ब्रह्म हैजब यह दिख जाता है, तब“मेरी इच्छा”“मेरा भाग्य”दोनों मिथ्या हो जाते हैं।यही अहंकार की मृत्यु है।सूफ़ी फ़ना–बक़ा का अनुभवइच्छा का लोप → ईश्वर की चाहफ़ना = अपनी चाह का गलनाबक़ा = उसी की चाह में जीवित रहनासूफ़ी कहते हैं —जो तू चाहता है, वो तू नहीं है;जो उससे चाहता है, वही तू है।यहाँ “मांग” नहीं रहती,रज़ा (ईश्वर की मर्ज़ी) रह जाती है।सबसे गहरी बात (गुप्त रहस्य)जब साधक देख लेता है कि —इच्छा भी उसकी दी हुई है,तो मांग किससे?यहीं कर्म बंधन नहीं बनता।यहीं प्रारब्ध भी जलने लगता है।निष्कर्ष (तीनों का एक स्वर)कर्म करो — पर कर्ता मत बनोइच्छा उठे — पर मालिक मत बनोजो मिले — उसे उसकी रज़ा समझोयही गीता है।यही अद्वैत है।यही सूफ़ी फ़ना–बक़ा है।