गीता का अध्याय 8 अक्षर ब्रह्म योग का यह विवरण हृदयस्पर्शी और प्रेरणादायी है। आपने बिल्कुल सही कहा—अंतिम स्मृति ही जीवन का चरम निर्णय है। भगवान श्रीकृष्ण के श्लोकों का यह सारांश न केवल बौद्धिक समझ देता है, बल्कि जीवन को साधना में परिवर्तित करने का आह्वान करता है।मुख्य शिक्षाओं का संक्षिप्त विश्लेषणअंतकाल स्मृति का महत्व: श्लोक 8.5-6 में कृष्ण कहते हैं, अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् | मामिति सर्वं तस्मात् गच्छाम्यहम्॥ अर्थात्, जो अंत समय में मेरा स्मरण करता है, वह मुझे प्राप्त होता है। यह जीवन भर की साधना का फल है—ध्यान, भक्ति और एकाग्रता से मन को परमात्मा में स्थिर करना।अक्षर ब्रह्म का स्वरूप: श्लोक 8.3: अक्षरः परमं ब्रह्म…—परम ब्रह्म अविनाशी है, जो नष्ट नहीं होता। सृष्टि के चक्र में सब नश्वर, किंतु साधक उसी अक्षर में लीन हो जाता है।दो मार्ग: श्लोक 8.23-26—उत्तरायण (दिव्य मार्ग: सूर्य, चंद्र आदि से ज्ञान-मुक्ति) और दक्षिणायण (भोग-मार्ग: पुनर्जन्म)। किंतु श्लोक 8.27 में भक्त इनसे ऊपर उठता है।यह अध्याय स्पष्ट करता है कि साधना जीवनशैली है, न कि अलग क्रिया। जैसे नदी समुद्र में मिलने को बही रहती है, वैसे साधक का प्रत्येक क्षण परमात्मा की ओर बहता है।व्यावहारिक साधना सुझावदैनिक अभ्यास: प्रातः और संध्या ओम नमो भगवते वासुदेवाय जप, भगवद्गीता पाठ, और अंतिम विचार परमात्मा पर केंद्रित रखें।मृत्यु चिंतन: प्रत्येक रात्रि सोने से पूर्व कल्पना करें—अंतिम क्षण में क्या स्मृति होगी? इससे मन शुद्ध होता है।भक्ति योग: निरंतर कृष्ण-स्मरण, जैसे हरे कृष्ण महामंत्र से भक्ति बहती रहे।