गुरु का देह रूप तो सबको दिखता है — वही सामान्य दृष्टि है।पर गुरु के हृदय में कौन विराजमान है, यह केवल वही जान सकता हैजिसकी दृष्टि बाहर से भीतर की ओर मुड़ गई हो।जिस दिन साधक यह पहचान लेता है किगुरु के हृदय में अहंकार नहीं, परमात्मा ही आसन लगाए बैठा है,उसी दिन गुरु व्यक्ति नहीं रहता,वह द्वार बन जाता है।और तब—गुरु को “समझना” नहीं पड़तागुरु को “परीखना” नहीं पड़ताकेवल समर्पण घटित होता हैआपने “दिल में कैद कर उसका गुलाम बनना” कहा —यह दासता नहीं, यह तो अहंकार की मृत्यु है।यहीं से सच्ची साधना शुरू होती है,क्योंकि तब साधक गुरु की नहीं,गुरु में बैठे परम की आज्ञा का अनुयायी होता है।बाक़ी सब गुरु को देखते हैं,कुछ गुरु से सीखते हैं,पर जो यह रहस्य जान लेता हैवह गुरु में लय हो जाता है।और सच यही है —जिसने यह पहचान नहीं की,वह चाहे जितनी क्रियाएँ कर ले,वह साधना नहीं, केवल अभ्यास ही रह जाता है।मेरा ये कथन वेदांत, सूफ़ी और भक्ति —तीनों की आत्मा को एक ही वाक्य में बाँध देता है।
HomeVachanगुरु का देह रूप तो सबको दिखता है — वही सामान्य दृष्टि है।पर गुरु के हृदय में कौन विराजमान है, यह केवल वही जान सकता हैजिसकी दृष्टि बाहर से भीतर की ओर मुड़ गई हो।जिस दिन साधक यह पहचान लेता है किगुरु के हृदय में अहंकार नहीं, परमात्मा ही आसन लगाए बैठा है,उसी दिन गुरु व्यक्ति नहीं रहता,वह द्वार बन जाता है।और तब—गुरु को “समझना” नहीं पड़तागुरु को “परीखना” नहीं पड़ताकेवल समर्पण घटित होता हैआपने “दिल में कैद कर उसका गुलाम बनना” कहा —यह दासता नहीं, यह तो अहंकार की मृत्यु है।यहीं से सच्ची साधना शुरू होती है,क्योंकि तब साधक गुरु की नहीं,गुरु में बैठे परम की आज्ञा का अनुयायी होता है।बाक़ी सब गुरु को देखते हैं,कुछ गुरु से सीखते हैं,पर जो यह रहस्य जान लेता हैवह गुरु में लय हो जाता है।और सच यही है —जिसने यह पहचान नहीं की,वह चाहे जितनी क्रियाएँ कर ले,वह साधना नहीं, केवल अभ्यास ही रह जाता है।मेरा ये कथन वेदांत, सूफ़ी और भक्ति —तीनों की आत्मा को एक ही वाक्य में बाँध देता है।