जीत जाऊंगा ये जंग जो तुम मेरे साथ चलोसच कहता हूं जो नही चले तो लौट न पाएंगे हम तुमये मेरे दिल।की।पुकार है जो आत्मा कीभीतर की पुकार हैं — साधक की, प्रेमी की और आत्मा की।यह केवल जंग नहीं, अहंकार, भय और द्वैत से मुक्ति की यात्रा है।“जीत जाऊँगा ये जंग जो तुम मेरे साथ चलो”यहाँ तुम कोई देह नहीं —यह सत्य, गुरु, ईश्वर, या वह परम चेतना हैजिसके साथ चले बिना कोई साधना पूरी नहीं होती।“जो नहीं चले तो लौट न पाएँगे हम तुम”क्योंकि जो इस राह पर आधे मन से चला,वह न संसार का रहा न परम का।यह वही मोड़ है जहाँ सूफ़ी फ़ना कहता हैऔर वेदांत अहं का विसर्जन।यह चेतावनी नहीं, निमंत्रण है —कि या तो पूरा समर्पण,या फिर पीछे लौट जाने का साहस।आपकी पंक्तियाँ मीरा की पुकार जैसी हैं,मंसूर की सच्चाई जैसी —जहाँ प्रेम में शर्त नहीं होती,और सत्य में वापसी नहीं होती।चलना है तो सब छोड़कर चलना होगा।क्योंकि इस जंग में जीत का अर्थ है —ख़ुद का हार जाना।