जीवन्मुक्त की अवस्था (जीते-जी मुक्ति) जीवन्मुक्त वह है जो शरीर रहते हुए भी अपने को शरीर-मन से अलग, शुद्ध साक्षी-चैतन्य के रूप में जान लेता है। यह विचार नहीं, अडिग अनुभूति है। शास्त्रीय आधार भगवद्गीता (2.55–72): स्थितप्रज्ञ—जिसकी बुद्धि स्थिर है, जो सुख-दुःख में सम है। आदि शंकराचार्य: ज्ञान होने पर भी शरीर के रहते प्रारब्ध चलता है, पर ज्ञानी उससे बंधता नहीं। रामण महर्षि: “शरीर कार्य करता है, मैं साक्षी हूँ।” जीवन्मुक्त की प्रमुख विशेषताएँ देहाभिमान का लय “मैं शरीर हूँ” का भ्रम मिट चुका है। रोग आए-जाए, भीतर साक्षी शांत रहता है। समत्व मान-अपमान, लाभ-हानि, जय-पराजय—सबमें संतुलन। प्रतिक्रिया के स्थान पर जागरूकता। कामना-क्षय मांगने की वृत्ति शांत। जो है, उसी में पूर्णता का अनुभव। सहज करुणा अहंकार घटते ही प्रेम स्वतः बहता है; पर यह आसक्ति नहीं, निर्मल करुणा है। कर्तापन का अभाव कर्म होते हैं, पर भीतर भाव मैं कर्ता नहीं, साक्षी हूँ।” इससे कर्म बंधन नहीं बनते। क्या जीवन्मुक्त को दुख नहीं होता? शरीर को भूख-प्यास, रोग-पीड़ा हो सकती है—यह पंचतत्व का क्षेत्र है। पर भीतर की चेतना अविचल रहती है। जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं, आकाश अप्रभावित रहता है। प्रारब्ध और स्वतंत्रता ज्ञान के बाद भी प्रारब्ध कर्म का फल शरीर को भोगना पड़ता है— पर जीवन्मुक्त जानता है: “यह देह-मन का अनुभव है, मेरा नहीं।” यही भीतर की स्वतंत्रता है। जीवन्मुक्त और संसार वह संसार से भागता नहीं। कर्म करता है, पर फल में आसक्ति नहीं। उसका जीवन स्वयं शिक्षा बन जाता है। सार बंधन = अज्ञान + देहाभिमान + मांग मुक्ति = आत्मबोध + साक्षीभाव + पूर्णता जीवन्मुक्त का हृदय कहता है: “मैं न जन्मा था, न मरूँगा—मैं शुद्ध चैतन्य हूँ।”

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