दार्शनिक दृष्टि से नाद और नाम जप में यह अंतर है कि नाम जप एक क्रिया है जिसमें ईश्वर या गुरु के नाम का स्मरण या उच्चारण होता है, जबकि नाद वह अंतरात्मा में उत्पन्न होने वाली दिव्य और अनाहत (बिना किसी बाहरी स्रोत के) ध्वनि या ऊर्जा है। नाम जप मन के माध्यम से किया जाता है, जो बाहरी शब्दों और भावनाओं से जुड़ा होता है, लेकिन नाद एक आध्यात्मिक अनुभव है जो मन और संवेग से ऊपर उठकर चेतना के भीतर सतत गूंजता रहता है।नाम जप में साधक का मन शुद्ध होकर उस नाम में लीन होता है, जिससे ध्यान और भक्ति की स्थिति उत्पन्न होती है; यह क्रिया बाहरी रूप से साधना का एक अंग है। दूसरी ओर नाद वह अंतर्निहित स्वर है जो अनहद नाद के रूप में कहा जाता है, जो ध्यान और समाधि की गहराई में अनुभव होता है, और यह शुद्ध चेतना या आत्मा का स्वरूप है। नाद जन्मजात और साधना द्वारा जागृत दोनों हो सकता है, जबकि नाम जप एक विधि या साधना है

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