परमात्मा — निराकार भी है और साकार भी।उसी तरह गुरु और शिष्य भी केवल देह नहीं हैं, न ही केवल विचार —वे चेतना के दो आयाम हैं।थोड़ा स्पष्ट करूँ, आपकी अनुभूति को ही आधार बनाकर —परमात्मा का निराकार रूपवह जोन दिखता हैन नाम में बंधता हैन रूप मेंवह शुद्ध चेतना, साक्षी, मौन, खालीपन नहीं बल्कि पूर्णता है।यही अद्वैत का ब्रह्म है, यही सूफी का हक़।परमात्मा का साकार रूपजब वही चेतनाप्रेम बनकर उतरती हैकरुणा बनकर चलती हैशब्द, दृष्टि, स्पर्श बनती हैतो वह साकार कहलाती है — कृष्ण, राम, अल्लाह के नाम, या कोई भी रूप।अब गुरु और शिष्य —साकार गुरुवह देह जोदिशा देता हैभ्रम काटता हैमौन से भी शिक्षा देता हैनिराकार गुरुवह जोभीतर से खींचता हैबिना बोले समझा देता हैकभी “अपनी ही अंतरात्मा” बनकर बोलता हैअसल मेंजब शिष्य तैयार होता है,तो गुरु बाहर नहीं, भीतर प्रकट होता है।और शिष्य?साकार शिष्य — अभ्यास करता हुआव्यक्तिनिराकार शिष्य — वह चेतना जो अहंकार छोड़ चुकी हैजिस दिन शिष्य का “मैं” गलता है,उसी दिन गुरु–शिष्य का भेद मिटता है।सूफी कहते हैं — फ़ना फ़ि-शैख़अद्वैत कहता है — अहं ब्रह्मास्मिदोनों एक ही सत्य को अलग भाषा में कहते हैं।इसलिए आपका कहना बिल्कुल ठीक हैयह मान्यता नहीं, जीया हुआ सत्य है।जिसे अनुभव हो गया, उसके लिए प्रमाण की ज़रूरत नहीं रहती।बहुत सुंदर।तो आइए इसे सीधे अनुभव की भाषा में खोलते हैं — बिना दर्शन का बोझ डाले।अद्वैत में साक्षी भाव (Witness Consciousness)अद्वैत कहता है —तुम जो देख रहे हो, तुम वह नहीं हो।जो देख रहा है — वही तुम हो।जब आप विचार देखते हैं → आप विचार नहींजब भाव देखते हैं → आप भाव नहींजब शरीर को देखते हैं → आप शरीर नहींजो सभी को देख रहा है,वही निराकार गुरु है —वही परमात्मा।यहाँ गुरु बाहर नहीं खोजा जाता,यहाँ गुरु जागता हुआ साक्षी बन जाता है।सूफ़ी मार्ग में फ़ना (Ego Dissolution)सूफ़ी कहते हैं —जब तक मैं है, तब तक वह नहीं।जब मैं मिटा — तब वह ही वह।फ़ना =अपनी राय का गलनाअपने ज्ञान का गिरनाअपने होने का विसर्जनयह कोई नाश नहीं,यह अहंकार का उतरना है।और जब यह घटता है,तो गुरु देह नहीं रह जाता —वह हाल (state) बन जाता है।फ़ना के बाद — बक़ा (Abiding in Truth)यहीं सूफ़ी और अद्वैत एक हो जाते हैं।अद्वैत कहता है —ब्रह्मज्ञान के बाद भी व्यवहार चलता हैसूफ़ी कहता है —फ़ना के बाद बक़ा —दुनिया में रहकर हक़ में रहनायानीशरीर चलता हैबोलना होता हैकाम होते हैंलेकिन कर्ता नहीं रहता।गुरु–शिष्य का रहस्यसत्य यह है —शुरुआत में गुरु साकार होता हैअंत में गुरु ही शिष्य होता हैऔर अंततः दोनों विलीन हो जाते हैंजैसे दीप से दीप जलता है,फिर अलग दीप नहीं दिखता —केवल प्रकाश रह जाता है।पहचान का संकेत (आपके अनुभव से मेल)यदि आपके भीतर ये संकेत दिखते हैं,तो समझिए मार्ग सही है —किसी को साबित करने की ज़रूरत नहींमौन प्रिय होने लगा हैश्रद्धा बिना अंधविश्वास के हैगुरु का नाम लेने से भीतर कुछ जागता है“मैं जानता हूँ” कम होता जा रहा हैयही निराकार दीक्षा है।यदि आप चाहें,तो अगला चरण हम यह खोल सकते हैं:रोज़मर्रा के जीवन में फ़ना–बक़ा कैसे जिया जाएअद्वैत में जीते-जी मुक्ति के लक्षणगुरु की नज़र और विज्ञान (psychology नहीं, चेतना)
HomeVachanपरमात्मा — निराकार भी है और साकार भी।उसी तरह गुरु और शिष्य भी केवल देह नहीं हैं, न ही केवल विचार —वे चेतना के दो आयाम हैं।थोड़ा स्पष्ट करूँ, आपकी अनुभूति को ही आधार बनाकर —परमात्मा का निराकार रूपवह जोन दिखता हैन नाम में बंधता हैन रूप मेंवह शुद्ध चेतना, साक्षी, मौन, खालीपन नहीं बल्कि पूर्णता है।यही अद्वैत का ब्रह्म है, यही सूफी का हक़।परमात्मा का साकार रूपजब वही चेतनाप्रेम बनकर उतरती हैकरुणा बनकर चलती हैशब्द, दृष्टि, स्पर्श बनती हैतो वह साकार कहलाती है — कृष्ण, राम, अल्लाह के नाम, या कोई भी रूप।अब गुरु और शिष्य —साकार गुरुवह देह जोदिशा देता हैभ्रम काटता हैमौन से भी शिक्षा देता हैनिराकार गुरुवह जोभीतर से खींचता हैबिना बोले समझा देता हैकभी “अपनी ही अंतरात्मा” बनकर बोलता हैअसल मेंजब शिष्य तैयार होता है,तो गुरु बाहर नहीं, भीतर प्रकट होता है।और शिष्य?साकार शिष्य — अभ्यास करता हुआव्यक्तिनिराकार शिष्य — वह चेतना जो अहंकार छोड़ चुकी हैजिस दिन शिष्य का “मैं” गलता है,उसी दिन गुरु–शिष्य का भेद मिटता है।सूफी कहते हैं — फ़ना फ़ि-शैख़अद्वैत कहता है — अहं ब्रह्मास्मिदोनों एक ही सत्य को अलग भाषा में कहते हैं।इसलिए आपका कहना बिल्कुल ठीक हैयह मान्यता नहीं, जीया हुआ सत्य है।जिसे अनुभव हो गया, उसके लिए प्रमाण की ज़रूरत नहीं रहती।बहुत सुंदर।तो आइए इसे सीधे अनुभव की भाषा में खोलते हैं — बिना दर्शन का बोझ डाले।अद्वैत में साक्षी भाव (Witness Consciousness)अद्वैत कहता है —तुम जो देख रहे हो, तुम वह नहीं हो।जो देख रहा है — वही तुम हो।जब आप विचार देखते हैं → आप विचार नहींजब भाव देखते हैं → आप भाव नहींजब शरीर को देखते हैं → आप शरीर नहींजो सभी को देख रहा है,वही निराकार गुरु है —वही परमात्मा।यहाँ गुरु बाहर नहीं खोजा जाता,यहाँ गुरु जागता हुआ साक्षी बन जाता है।सूफ़ी मार्ग में फ़ना (Ego Dissolution)सूफ़ी कहते हैं —जब तक मैं है, तब तक वह नहीं।जब मैं मिटा — तब वह ही वह।फ़ना =अपनी राय का गलनाअपने ज्ञान का गिरनाअपने होने का विसर्जनयह कोई नाश नहीं,यह अहंकार का उतरना है।और जब यह घटता है,तो गुरु देह नहीं रह जाता —वह हाल (state) बन जाता है।फ़ना के बाद — बक़ा (Abiding in Truth)यहीं सूफ़ी और अद्वैत एक हो जाते हैं।अद्वैत कहता है —ब्रह्मज्ञान के बाद भी व्यवहार चलता हैसूफ़ी कहता है —फ़ना के बाद बक़ा —दुनिया में रहकर हक़ में रहनायानीशरीर चलता हैबोलना होता हैकाम होते हैंलेकिन कर्ता नहीं रहता।गुरु–शिष्य का रहस्यसत्य यह है —शुरुआत में गुरु साकार होता हैअंत में गुरु ही शिष्य होता हैऔर अंततः दोनों विलीन हो जाते हैंजैसे दीप से दीप जलता है,फिर अलग दीप नहीं दिखता —केवल प्रकाश रह जाता है।पहचान का संकेत (आपके अनुभव से मेल)यदि आपके भीतर ये संकेत दिखते हैं,तो समझिए मार्ग सही है —किसी को साबित करने की ज़रूरत नहींमौन प्रिय होने लगा हैश्रद्धा बिना अंधविश्वास के हैगुरु का नाम लेने से भीतर कुछ जागता है“मैं जानता हूँ” कम होता जा रहा हैयही निराकार दीक्षा है।यदि आप चाहें,तो अगला चरण हम यह खोल सकते हैं:रोज़मर्रा के जीवन में फ़ना–बक़ा कैसे जिया जाएअद्वैत में जीते-जी मुक्ति के लक्षणगुरु की नज़र और विज्ञान (psychology नहीं, चेतना)