पिताजी ने “इश्क़े मिज़ाजी” और “इश्क़े हंकिंकि” के बारे में जो कहा, वह सूफी और अध्यात्मिक परंपरा में बहुत ही महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। इसे समझने के लिए हम इन दोनों प्रकार के प्रेम और उनके अध्यात्म में महत्व को देखें।इश्क़े मिजाजी और इश्क़े हंकिंकि का अर्थइश्क़े मिजाजी (भौतिक प्रेम)यह प्रेम भौतिक, सांसारिक, और भौतिक इच्छाओं से जुड़ा होता है। इसमें प्रेम की शुरुआत शरीर, रूप, सुख-सुविधा, और सांसारिक आकर्षण से होती है। यह प्रेम सामान्य जीवन में प्रेम के प्रथम चरण के रूप में माना जाता है, जहाँ प्रेम व्यक्ति के मनोभाव, स्वार्थ और भौतिक आवेश से जुड़ा होता है। सूफी कवि बुल्लेशाह ने इसे भौतिक प्रेम कहा है, जो कि अधिकतर “मजा” जैसी सामाजिक या सांसारिक इच्छाओं का संबंध है �.इश्क़े हंकिंकि (आध्यात्मिक प्रेम)यह प्रेम अधिक गहरा, निरंतर और परमात्मा के साथ संबंध स्थापित करने वाला होता है। इसमें प्रेम का उद्देश्य सांसारिक से ऊपर उठकर, आत्मा और परमात्मा के बीच स्थायी संबंध बनाना है। इसे “हकीकी” (सच्चा या आध्यात्मिक) प्रेम कहा जाता है। सूफी और अध्यात्मिक परंपरा में इसे प्रेम की अंतिम अवस्था माना जाता है, जिसमें प्रेम बस में रहता है, ego खत्म हो जाता है और आत्मिक मिलन का अनुभव होता है। बुल्लेशाह ने इस प्रेम को पारलौकिक, परमात्मा का प्रेम कहा है, जो कि सहज, निरंतर और शाश्वत है �.अध्यात्म में इन दोनों प्रेम का योगदानइश्क़े मिज़ाजी जगत और शरीर के प्रेम का प्रतीक है, जो शुरुआत में आत्मा को भटकाने वाला हो सकता है।इश्क़े हंकिंकि वह उच्चस्तर का प्रेम है, जो आत्मा को परमात्मा की ओर ले जाता है, शांति और समाधि की अवस्था प्रदान करता है।यह दोनों प्रेम क्रमशः आत्मा की यात्रा में आवश्यक चरण हैं: पहले सांसारिक प्रेम, फिर स्वार्थवाद और अंत में, परमात्मा के प्रेम में लीनता �.अंतिम बातपिताजी का यह कथन कि भक्तिसिद्धांत में इन दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है, यह दिखाता है कि अध्यात्मिक यात्रा में प्रेम का स्वरूप परिवर्तनशील होता है। सांसारिक प्रेम से शुरू कर, धीरे-धीरे वह अंतर्मुख होकर, आत्मा और परमात्मा के प्रेम में परिणित होता है।यह सम्पूर्ण प्रक्रिया प्रेम की परिपक्वता और आत्मा का परमानंद में प्रवेश के लिए आवश्यक मानी जाती है।

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