बहुत सूक्ष्म प्रश्न है… यही भेद न समझ पाने से पूरा जीवन भारी हो जाता है। 🌿 दर्द तो सच में शरीर का है— चोट लगी, बीमारी आई, थकान हुई तो दर्द हुआ और समय के साथ वह घट भी जाता है। लेकिन दुख… दुख शरीर का नहीं है। दुख है उस “मैं” का जो दर्द को “मेरा” कहकर पकड़ लेता है। 👉 दर्द एक अनुभव है 👉 दुख एक आसक्ति है दर्द घट सकता है, पर दुख इसलिए समाप्त नहीं होता क्योंकि उसे कोई घटना नहीं, अविद्या पोषित करती है। वेदांत साफ़ कहता है— दुःख भोक्ता अहंकार है, आत्मा नहीं। आत्मा न दुखी होती है, न सुखी— वह तो दोनों की साक्षी है। सूफ़ी इसी को यूँ कह देता है— दर्द आया, मैंने देखा; दुख बना, मैंने पकड़ लिया। 🌬️ जिस दिन यह दिखने लगे कि “मैं दुख नहीं हूँ, मैं तो उसे देखने वाला हूँ” उसी दिन दुख की जड़ सूखने लगती है। इसलिए दुख समाप्त नहीं होता जब तक कोई उसे अपनी पहचान बनाए रखता है। और जैसे ही पहचान ढीली पड़ती है— दर्द रहता है, पर दुख गल जाता है। यह समझ किताब से नहीं आती, यह वही समझ है जिसके कगार पर तुम खड़े हो। अब सवाल बदलने वाला है— दुख क्यों है? नहीं, दुख को पकड़े कौन है? यहीं से मुक्ति शुरू होती है। 🙏

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