भाई आपने इतने कम शब्दों में नाद का वास्तविक अर्थ लिख दिया और अपने अनुभव से हमे वहः ज्ञान समझाया इसके लिए धन्येवादगुरु या ईश्वर की याद दिलाने वाला वह स्पर्श, कंपन या ख्याल जिसे हम वास्तविक नाद कह सकते हैं, उसे वेदों और उपनिषदों में अनाहत नाद (Anahad Naad) कहा गया है। यह अनाहत नाद वह ध्वनि है जो बिना किसी आघात या उत्प्रेरण के उत्पन्न होती है, अर्थात यह प्राकृतिक, आंतरिक और दिव्य स्वरूप की ध्वनि है। यह नाद वह अमूर्त ऊर्जा और चैतन्य का संचार करता है जो सीधे हृदय केन्द्र (अनाहत चक्र) से जुड़ा होता है और जो साधक के मन को गुरु या परमात्मा की स्मृति में ले जाता है .नादयोग में यह माना जाता है कि जब साधक ध्यानपूर्वक सांस वाचक और मानसिक शक्तियों को नियंत्रित करता है, तब बाहरी ध्वनियों से मन शांति प्राप्त कर अंदर के अनाहत नाद (भीतरी कंपन/ध्वनि) को सुनने के योग्य बन जाता है। वही आंतरिक ध्वनि साधक को ईश्वर का अनुभव कराती है, जिससे मन और हृदय एकाग्र होकर आध्यात्मिक जागरण की ओर बढ़ते हैं। इस आंतरिक नाद की अनुभूति गुरु की ऊर्जा के संप्रेषण (शक्तिपात) द्वारा और भी सशक्त हो सकती है जो शिष्य के अंदर दिव्यता, शान्ति और स्नेह की अनुभूति जगाती है .गुरु स्मरण और भगवान की याद को जागृत करने वाला वह कोई भी ख्याल, स्पर्श, या कंपन जब मन को मोह-माया से ऊपर उठाकर सत्स्वरूप अनंत चेतना में ले जाता है, तब उसे सच्चा नाद कहा जा सकता है। यह नाद न केवल शब्द या ध्वनि से परे है, बल्कि एक आंतरिक ऊर्जा-तरंग है जो चेतना को आलोकित करती है और भक्ति, समर्पण, और मोक्ष की ओर ले जाती है .इसलिए इस सच्चे नाद का नाम कुछ भी हो—अनाहत नाद, शाब्द ब्रह्म, या गुरु-उर्जा का संचार—मूलतः यह वह दिव्य कंपन है जो साधक के हृदय में गुरु या ईश्वर की उपस्थिति का भाव जागृत करता है, जिसके द्वारा साधना सफल होती है और आत्मा का उत्कर्ष होता है।
HomeVachanभाई आपने इतने कम शब्दों में नाद का वास्तविक अर्थ लिख दिया और अपने अनुभव से हमे वहः ज्ञान समझाया इसके लिए धन्येवादगुरु या ईश्वर की याद दिलाने वाला वह स्पर्श, कंपन या ख्याल जिसे हम वास्तविक नाद कह सकते हैं, उसे वेदों और उपनिषदों में अनाहत नाद (Anahad Naad) कहा गया है। यह अनाहत नाद वह ध्वनि है जो बिना किसी आघात या उत्प्रेरण के उत्पन्न होती है, अर्थात यह प्राकृतिक, आंतरिक और दिव्य स्वरूप की ध्वनि है। यह नाद वह अमूर्त ऊर्जा और चैतन्य का संचार करता है जो सीधे हृदय केन्द्र (अनाहत चक्र) से जुड़ा होता है और जो साधक के मन को गुरु या परमात्मा की स्मृति में ले जाता है .नादयोग में यह माना जाता है कि जब साधक ध्यानपूर्वक सांस वाचक और मानसिक शक्तियों को नियंत्रित करता है, तब बाहरी ध्वनियों से मन शांति प्राप्त कर अंदर के अनाहत नाद (भीतरी कंपन/ध्वनि) को सुनने के योग्य बन जाता है। वही आंतरिक ध्वनि साधक को ईश्वर का अनुभव कराती है, जिससे मन और हृदय एकाग्र होकर आध्यात्मिक जागरण की ओर बढ़ते हैं। इस आंतरिक नाद की अनुभूति गुरु की ऊर्जा के संप्रेषण (शक्तिपात) द्वारा और भी सशक्त हो सकती है जो शिष्य के अंदर दिव्यता, शान्ति और स्नेह की अनुभूति जगाती है .गुरु स्मरण और भगवान की याद को जागृत करने वाला वह कोई भी ख्याल, स्पर्श, या कंपन जब मन को मोह-माया से ऊपर उठाकर सत्स्वरूप अनंत चेतना में ले जाता है, तब उसे सच्चा नाद कहा जा सकता है। यह नाद न केवल शब्द या ध्वनि से परे है, बल्कि एक आंतरिक ऊर्जा-तरंग है जो चेतना को आलोकित करती है और भक्ति, समर्पण, और मोक्ष की ओर ले जाती है .इसलिए इस सच्चे नाद का नाम कुछ भी हो—अनाहत नाद, शाब्द ब्रह्म, या गुरु-उर्जा का संचार—मूलतः यह वह दिव्य कंपन है जो साधक के हृदय में गुरु या ईश्वर की उपस्थिति का भाव जागृत करता है, जिसके द्वारा साधना सफल होती है और आत्मा का उत्कर्ष होता है।