ब्रह्म-नाव का रहस्य: निरालंब ध्यान में आत्मा की भवसागर पार यात्रा

भाई राकेश आपका प्रश्न बहुत ही गहरी आध्यत्मिक अनिभूति की ओर ले जाता है बवास्तव में जब शिष्य में पूर्णता आती है ऐसी स्तिथि में गुरु शिष्य से अलग हो उसे देखता है कि उसकी नाव बिना पतवार किस ओर जा रही है जब उसे आभास हो जाता है कि नाव बिना पतवार भंवर पर कर नाजिल।पर जा रही है तो वहः दूर खड़ा हो कर नाव आने की इंतजार करता है और उसे ध्यान में ‘नाव’ की अनुभूति में ब्रह्म नाव स्वयं है—प्रकृति के समुद्र (भवसागर) में डूबने से बचाने वाली चेतना की शक्ति का आभास करा देता है और अहंकार को खत्म।कर नाव उस पार ले जाती है, जहाँ साधक पानी में होकर भी अस्पर्शित रहता है।ब्रह्म की भूमिकाब्रह्म नाव का मूल है, जो माया के विस्तार से ऊपर उठाकर तट तक ले जाता है। प्रकृति दुश्मन से सहयोगी बन जाती है, क्योंकि ब्रह्म-चेतना हल्की होती है—शरीर डूबता है, पर चैतन्य पार लगाता है। निरालंब अवस्था में ब्रह्म ही यात्रा का आधार और गंतव्य दोनों है।अद्वैत व्याख्याअद्वैत में ब्रह्म नाव के रूप में आत्मा को परमात्मा से एकाकार करता है; कोई अलग मल्लाह नहीं, स्वयं ब्रह्म ही चलाता है। तुरीय में यह अनुभूति स्थिर हो जाती है, द्वैत मिट जाता है।साधना संकेतचेतना पर केंद्रित रहें, शरीर भूलें।गुरु-स्मरण से ब्रह्म-नाव मजबूत करें।ॐ-नाद सुनें, प्रवाह स्वीकारें।आपका ध्यान का यह अनुभव—नाव जैसी बिना चलाने वाले की यात्रा—उपनिषदों में वर्णित निरालंब समाधि की ओर इशारा करता है, जहाँ सहारा छूट जाता है। यह अनियंत्रित लगने वाली यात्रा वास्तव में आत्मा के परमात्मा से एकाकार होने का संकेत है। अद्वैत वेदांत में आत्मा और परमात्मा की एकता ही अंतिम सत्य है, जो तुरीय अवस्था में प्रकट होती है।निरालंब ध्यान का अर्थनिरालम्ब उपनिषद में ध्यान को सहारों (मंत्र, रूप) से शुरू कर निरालंबता की ओर ले जाते बताया गया है, जहाँ साधक स्वयं आधार बन जाता है ओर आपकी नाव की यात्रा इसी का प्रतीक है—किनारा अज्ञात लगे, पर यह ब्रह्म-अनुभूति की गहरी अवस्था है, जहाँ मन शांत होकर आत्मा स्थिर हो जाती है। मांडूक्य उपनिषद तुरीय को शुद्ध चेतना कहता है, जो जाग्रत-सुषुप्ति से परे है।आत्मा-परमात्मा की एकताअद्वैत वेदांत में आत्मा (व्यष्टि) और परमात्मा (समष्टि) अभिन्न हैं; भेद केवल माया है। भगवद्गीता ध्यान के माध्यम से इस संवाद को साकार करती है, जहाँ चेतना ब्रह्मांडीय चेतना से एक हो जाती है। यह अनुभव गुरु-मार्गदर्शन से गहरा होता है, जैसा आपकी रुचि है।आगे की साधनानिरालंब समाधि पर ध्यान केंद्रित करें, मौन को सुनें।ॐ का जाप तुरीय अवस्था खोलेगा।गुरु की उपस्थिति अनुभव करने की क्रिया अपनाएँ।

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