मुर्शिद के साथ आध्यात्मिक ताल्लुक निभाने के लिए पूर्ण समर्पण, नियमित स्मरण और आंतरिक अनुशासन आवश्यक है। यह रिश्ता बैअत से मजबूत होता है, जहाँ शिष्य मुर्शिद को केवल माध्यम मानता है, न कि अंतिम मंजिल।बैअत और निष्ठाबैअत लेकर मुर्शिद-मुरीद का रूहानी बंधन स्थापित करें, जिसमें तसव्वुर-ए-शेख (मुर्शिद के चेहरे का निरंतर स्मरण) प्रमुख है। हर समय मुर्शिद का ध्यान रखें, चाहे कोई कार्य कर रहे हों। यह ताल्लुक़ रूह को पाक करता है और उच्च मकाम तक ले जाता है।दैनिक अभ्यासनियमित धिक्र, मुराकबा और तवाज्जुह करें, मुर्शिद की निगाह से जुड़ने के लिए।व्यक्तिगत इच्छाओं को त्यागकर मुर्शिद के मार्गदर्शन का पालन करें।सोहबत (संगति) में विनम्र रहें, दिल से रूहानी रिश्ता जोड़ें।संतुलन बनाए रखेंरूहानी ताल्लुक़ में मुर्शिद को ईश्वर का प्रतिनिधि मानें, लेकिन उससे आगे परमात्मा की ओर बढ़ें। यह संतुलन मोक्ष की ओर ले जाता है, जैसा उपयोगकर्ता की मान्यता है।मुर्शिद या गुरु से दो प्रकार के संबंध होते हैं—रुहानी (आध्यात्मिक) और ज़ात का (लौकिक या व्यक्तिगत)। रुहानी ताल्लुक़ शिष्य को परम सत्य तक ले जाता है, जबकि ज़ात का ताल्लुक़ शिष्य को गुरु तक ही सीमित रख देता है, जिससे आगे की प्रगति रुक जाती है। ये दोनों संबंध भिन्न ज्ञान (इल्म) के आधार पर विकसित होते हैं।रुहानी ताल्लुक़रुहानी संबंध सूफी परंपरा में बैअत (निष्ठा की शपथ) से शुरू होता है, जहाँ मुर्शिद शिष्य को ईश्वर तक मार्गदर्शन करता है, न कि स्वयं को मंजिल बनाता है। यह गुरु-शिष्य परंपरा में आत्मिक आधार पर टिका होता है, जो शिष्य को स्वतंत्रता और मोक्ष प्रदान करता है। हिंदू वेदांत में भी यह स्व-ज्ञान के लिए आवश्यक है, गुरु केवल पुल का काम करता है।ज़ात का ताल्लुक़ज़ात का संबंध लौकिक होता है, जहाँ शिष्य गुरु को ही अंतिम लक्ष्य मान लेता है और उससे आगे सोच ही नहीं पाता। यह व्यक्तिगत लगाव या जातीय बंधन पैदा कर सकता है, जो आध्यात्मिक प्रगति को महदूद कर देता है। सूफी साहित्य में मुर्शिद को केवल मार्गदर्शक माना जाता है, न कि पूर्ण मंजिल।दोनों में अंतररुहानी ताल्लुक़ मुक्त करता है, जबकि ज़ात का बाँध लेता है। उपयोगकर्ता की रुचि के अनुसार, गुरु मोक्ष का माध्यम है, लेकिन स्वयं ईश्वर नहीं। सही संतुलन से ही सच्चा इल्म प्राप्त होता है।