मृत्यु के अंतिम समय में या उसके बाद लंबे समय तक सच्चे रूप से याद रखने वाले मुख्यतः करीबी परिवारजन जैसे पत्नी, बच्चे और कभी-कभी माता-पिता होते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से मरते वक्त इंसान सब भूल जाता है, लेकिन बच्चे और कभी मां की याद सबसे गहरी आती है, क्योंकि वे प्रेम और संस्कारों से जुड़े होते हैं।अंतिम समय की स्मृतियांमरने के ठीक पहले व्यक्ति की चेतना कर्मों, सांसारिक मोह और प्रियजनों पर केंद्रित हो जाती है। भगवद्गीता के अनुसार, मृत्यु के क्षण में जिसकी स्मृति होती है, वही अगले जन्म का आधार बनती है, और बच्चे-पत्नी जैसी नाजुक डोरें सबसे मजबूत रहती हैं। बाकी रिश्तेदार, दोस्त समय के साथ व्यस्तताओं में भूल जाते हैं।आध्यात्मिक दृष्टिकोणगीता और पुराणों में कहा गया है कि सच्ची स्मृति आत्मा के कर्म, संस्कार और गुरु-भक्ति से बनी रहती है, जो भौतिक संबंधों से परे जन्मों तक चलती है।साधक के लिए गुरु और ईश्वर की स्मृति अंतिम क्षण तक बनी रहती है, जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। भौतिक स्मृति क्षणिक है, आत्मिक अमर।हाँ, भौतिक दृष्टि से दुनिया इंसान को जल्दी भूल जाती है, केवल करीबी जैसे पत्नी-बच्चे ही लंबे समय तक याद रखते हैं, बाकी समय के साथ सब “होगा तो होगा, हमें क्या” सोचकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन आध्यात्मिक दर्शन में यह भौतिक जगत माया है जो क्षणभंगुर स्मृतियों पर टिका है, जबकि आत्मा के कर्म, संस्कार और स्मृति उसके साथ चली जाती हैं।भौतिक दुनिया की स्मृतिभौतिक लोक में मृत्यु के बाद आत्मा स्थूल शरीर छोड़कर सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करती है और कुछ समय (13 दिन तक) पृथ्वी पर ही रुक सकती है, लेकिन दुनिया के लोग धीरे-धीरे भूल जाते हैं। गीता कहती है कि जैसे पुराने वस्त्र त्यागकर नया धारण किया जाता है, वैसे आत्मा नया शरीर लेती है, पर भौतिक संबंध क्षणिक होते हैं। समय के साथ बाकी लोग अपनी व्यस्तता में व्यस्त होकर उपेक्षा कर देते हैं।आध्यात्मिक सत्यमृत्यु के बाद चार चीजें आत्मा के साथ जाती हैं: संचित कर्म, स्मृति, जागृति और सूक्ष्म शरीर। ये ब्रह्मांड में संग्रहीत रहती हैं, संस्कार अगले जन्म को प्रभावित करते हैं। भगवद्गीता के अनुसार, मृत्यु के समय जिस भाव की स्मृति होती है, वही अगले जन्म का आधार बनता है।सच्ची मुक्ति का मार्गसांसारिक स्मृति पर निर्भर न रहें, क्योंकि वह नश्वर है। कर्मयोग, भक्ति और ज्ञान से मोक्ष प्राप्त कर आत्मा जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्त हो जाती है। गुरु-शिष्य परंपरा में कृपा से आत्मा उच्च लोकों में शांति पाती है। यह दृष्टि भौतिक दुख से ऊपर उठाती है।भौतिक व्याख्या मृत्यु को स्थूल शरीर के अंत तक सीमित रखती है, जहाँ स्मृति केवल करीबी रिश्तों जैसे पत्नी-बच्चों तक रहती है और बाकी दुनिया समय के साथ भूल जाती है। आध्यात्मिक व्याख्या में स्मृति आत्मा के सूक्ष्म संस्कारों के रूप में अमर रहती है, जो जन्मों तक चलती है।भौतिक दृष्टिभौतिक जगत बाहरी दुनिया पर केंद्रित है—मृत्यु के बाद स्मृति मनोवैज्ञानिक और सामाजिक होती है, जो प्रेम, मोह या कर्तव्य से बंधी रहती है। अंतिम पलों में बच्चे-पत्नी की चिंता सबसे प्रबल होती है, क्योंकि ये जीविका और उत्तराधिकार से जुड़े होते हैं। समय के साथ यह स्मृति धुंधली पड़ जाती है, दुनिया आगे बढ़ जाती है।आध्यात्मिक दृष्टिआध्यात्मिकता आंतरिक आत्मा पर जोर देती है—मृत्यु के क्षण में गुरु, ईश्वर या कर्मों की स्मृति मोक्ष का द्वार खोलती है। गीता कहती है, “यत् भावना यास्यति सा तत्” अर्थात् जिसकी स्मृति होगी, वही भव। भौतिक मोह क्षणिक है, जबकि आध्यात्मिक स्मृति शाश्वत बंधन तोड़ती है।मुख्य अंतरभौतिक व्याख्या नश्वर संबंधों तक सीमित है, आध्यात्मिक अनंत यात्रा की ओर ले जाती है। साधक के लिए अंतिम स्मृति गुरु-कृपा या भक्ति से मुक्ति दिलाती है। यह फर्क जीवन को सार्थक बनाने का सार है। ।मिल गया जिसे माझी उसका क्या कहना उसने मौत के बाद उस पार मंजिल।पर पहुचा दिया दिलाकर जगह उसके चरणों मे जन्म जन्म का बंधन जोड़ कर्मो का भुगतान करवाया