मेरी यात्रा अंधेरे से उजाले की ओर


अंधकार, फिर उजाले की कणों की ओर बढ़ने की किरण महाप्रकाश यह एक गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक विचार है। इसमें शून्यता (शुण्यता) के उस अंधकार से प्रारंभ होकर वह महाशून्यता के और गहरे अंधकार की ओर बढ़ने की अवस्था को दर्शाया गया है, और फिर उस अंधकार से प्रकाश के शुरुआती कणों की ओर बढ़ने की क्रिया का वर्णन है। यह प्रक्रिया चेतना की प्रगति, निरपेक्ष शून्यता से परम प्रकाश के उदय का प्रतीक है।रामधारी सिंह “दिनकर” के कविता संग्रह जैसे गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक काव्य में भी हिमालय के संदर्भ में इस प्रकार के मौन, तपस्या और महाशून्य की खोज की बात मिलती है, जहां शून्य और महाशून्य का अनुभव समाधि और ध्यान की गूढ़ अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है। वहां यह विचार आता है कि यह महाशून्यता ध्यान-मग्नता और प्रलय के बीच की स्थिति हो सकती है, जिसके बाद अंततः नवीन प्रकाश उठता है जो चेतना का महाप्रकाश है।इस विचारधारा में शून्य और महाशून्य को अलग-अलग आध्यात्मिक स्थितियों के रूप में देखा जाता है—जहां शून्य प्रारंभिक अंधकार है, महाशून्य गहरी अनंतता का अंधकार है, और फिर उस परिसीमा से प्रकाश का उदय चेतना के उच्चतम स्तरों की ओर बढ़ाने वाली किरण बनकर प्रकट होता है।इस प्रकार, यह आपकी अभिव्यक्ति शून्यता के विभिन्न आध्यात्मिक पहलुओं से लेकर महाप्रकाश—अर्थात् सर्वोच्च प्रकाश या परम चेतना की ओर यात्रा का सूक्ष्म और सूचक वर्णन है। यह ध्यान, समाधि और आध्यात्मिक प्रकृति की प्रगाढ़ खोज को दर्शाता है।शुण्य रूपी अंधकार से महाशून्य रूपी अंधकार और फिर उजाले की कणों की ओर बढ़ती किरण महाप्रकाश की यह यात्रा गहरी आध्यात्मिक अनुभूति और चेतना की वह अनुभूति है, जो शून्यता के प्रारंभिक अंधकार से लेकर परमार्थिक प्रकाश के उच्चतम स्तर तक ले जाती है। यह प्रक्रिया ध्यान और समाधि के उस अनुभव को प्रकट करती है, जहाँ मानवीय चेतना अपने सीमित अस्तित्व से परे जाकर अनंतता के अंधकार (महाशून्यता) में डूबती है और फिर उस अनंतता से प्रकाश-रूपी दिव्यता में जाग्रत होती है।यह विचार भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में ध्यान और निर्वाण की यात्रा का सूचक है, जो अंततः आत्मा की परम चेतना या महाप्रकाश के अनुभव में समाप्त होती है। शून्य और महाशून्य के माध्यम से इस अनुभूति का निरूपण, उस गहन आध्यात्मिक अनुभूति का सौंदर्यपूर्ण और वेदनात्मक रूप है, जो हजारों वर्षों से गुरु-शिष्य परंपरा और योग-तत्व दर्शन में प्रकट होती आई है। ऐसे अनुभवों में शून्य अंधकार केवल निरर्थकता नहीं, बल्कि सृजनात्मक संभावनाओं से भरा स्रोत होता है, और महाशून्यता उस स्रोत की अनंत गहराई है।

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