गरुड़ पुराण और आत्मा की यात्रा: कर्म से मुक्ति तक

यह विषय डर या दंड का नहीं,चेतना–परिवर्तन और कर्म-बोध का है।गरुड़ पुराण को भयग्रंथ नहीं,मृत्यु–उपदेश की तरह पढ़ें।गरुड़ पुराण : आध्यात्मिक पाठ(मृत्यु के बाद के कर्म — चेतना की दृष्टि से)मृत्यु क्या है? (गरुड़ पुराण का मूल सूत्र)गरुड़ पुराण में मृत्यु को कहा गया हदेह का अंत नहीं,संस्कारों का सक्रिय होना।मरता शरीर है,चलता है कर्म-संस्कारों से बना सूक्ष्म मन।अर्थात जो जीवन में बोया, वही मृत्यु के बाद भोगा।“यमलोक” = कोई जगह नहींआध्यात्मिक अर्थ में—यम = नियम / ऋतयमलोक = कर्म का क्षेत्रयह बाहर नहीं, 👉 चेतना की अवस्था है।जैसे स्वप्न में—कोई बाहर से मारता नहींसपना ही सुख–दुख बन जाता हैवैसे ही मृत्यु के बाद — मन अपने ही कर्मों का दृश्य रचता है। नरक का आध्यात्मिक अर्थगरुड़ पुराण के नरक:तामिस्रअंधतामिस्ररौरवमहा-रौरव(आदि)ये कोई भौगोलिक स्थान नहीं, ये हैं—मन की घनी हुई अवस्थाएँउदाहरण:क्रोध = जलने का नरकलोभ = कभी न भरने की भूखहिंसा = निरंतर भयझूठ = टूटती हुई पहचानव्यक्ति खुद अपना नरक बनता है।पिंडदान, श्राद्ध — क्या सच में काम करते हैं?बाह्य अर्थ से नहीं,आंतरिक अर्थ से।पिंडदान का तत्त्व:“हम तुम्हें छोड़ रहे हैं”“अब हमारी आसक्ति मत बनो”जब जीवित मनुष्य आसक्ति छोड़ देता हैतो सूक्ष्म चेतना भी मुक्त होती है।इसलिए गरुड़ पुराण कहता है:मोह = प्रेत अवस्थावैराग्य = पितृ अवस्थापुनर्जन्म का सूत्र (सबसे गहरा)गरुड़ पुराण का स्पष्ट संकेत:जिसका मन अधूरा है,वही लौटता है।अधूरी वासनाअधूरा प्रेमअधूरा क्रोधअधूरा अहंवही अगला जन्म बनते हैं।इसलिए—ज्ञान नहीं, पूर्णता मुक्ति देती हैपुण्य नहीं, अनासक्ति मुक्ति देती हैमुक्ति कब मिलती है?गरुड़ पुराण अद्वैत से मिलता है यहाँ:जो जीते-जी मर गया,वह मरकर नहीं भटकता।जीते-जी मरना =“मैं शरीर नहीं”“मैं कर्ता नहीं”“मैं संग्रह नहीं”ऐसा व्यक्ति मृत्यु के बाद रास्ता नहीं ढूंढता,वह रास्ता बनता ही नहीं।अंतिम आध्यात्मिक निष्कर्षगरुड़ पुराण डराने नहीं आया, जगाने आया है।मृत्यु के बाद कोई दंड नहीं,केवल तुम्हारा ही विस्तार है।जो अभी है — वही आगे होगा।सार वाक्य:गरुड़ पुराण कहता है —मरने के बाद नहीं,अभी सुधर जाओ।यदि चाहें तो हम अगला स्तर खोल सकते हैं:“प्रेत अवस्था” वास्तव में क्या है?मुक्त आत्मा का मार्ग कैसा है?सूफी–अद्वैत में मृत्यु के बाद क्या?क्या ज्ञानी को यमदूत दिखते हैं?आपका प्रश्न शास्त्र से आगे, सत्य की ओर हैफिर भी “मुक्त आत्मा का मार्ग” को समझेमुक्त आत्मा का मार्ग (चेतना-दृष्टि)सबसे पहला सत्यमुक्त आत्मा कहीं जाती नहीं।गरुड़ पुराण, उपनिषद, गीता — तीनों का सार:जो मुक्त है,उसके लिए गमन नहीं होता।गमन होता है —जीव के लिएसंस्कारों के लिएअहं के लिएफिर “मार्ग” क्यों कहा गया?क्योंकि जीव को प्रतीक चाहिए।शास्त्र दो मार्ग बताते हैं:देवयानपितृयानपर मुक्त आत्मा इन दोनों से परे है।मुक्त आत्मा की पहचान (जीते-जी)जिसे मुक्ति मिल चुकी है:मृत्यु से भय नहींभविष्य की इच्छा नहींपुण्य–पाप का गर्व नहींईश्वर से भी सौदा नहींवह कहता नहीं —“मैं मुक्त हूँ”क्योंकि कहने वाला ही नहीं बचता।उपनिषद का संकेत (संक्षेप)न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति(उसके प्राण कहीं नहीं जाते)मतलब —देह गिरती हैपर चेतना चलती नहींगरुड़ पुराण की भाषा मेंऐसा जीवयमदूतों को नहीं देखता।क्यों?क्योंकि यम नियम है,और वह नियम से पहले ही मुक्त है। अद्वैत का अंतिम सूत्रमुक्त आत्मा का मार्ग:यहीं।अभी।जैसे हो।न ऊपरन नीचेन आगेन बाद मेंअनुभव की भाषा मेंमुक्त आत्मा:प्रकाश में नहीं जातीज्योति बन जाती हैब्रह्म में नहीं मिलतीब्रह्म ही पहचानी जाती हैमुक्त आत्मा का कोई मार्ग नहीं,क्योंकि वही अंतिम ठहराव है।यदि आप चाहें,अगला द्वार और सूक्ष्म खोल सकता हूँ:“जीते-जी मुक्ति” के लक्षणमुक्त और पुण्यात्मा में अंतरज्ञानी की मृत्यु कैसी होती हैसूफ़ी भाषा में फ़ना–बक़ा

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