शांगरी-ला घाटी महाभारत में प्रत्यक्ष रूप से “शांगरी-ला” नाम से नहीं उल्लिखित है, बल्कि इसे सिद्धाश्रम या ज्ञानगंज के रूप में वर्णित किया गया है, जो हिमालयी क्षेत्र में अमर सिद्धों का निवास है। महाभारत के वन पर्व (अध्याय 41-43) में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को दिए गए उपदेश में सिद्धाश्रम का जिक्र है, जहाँ समय का प्रभाव न्यून होता है और साधक लौटकर संसार में नहीं आते।महाभारतिक संदर्भमहाभारत में सिद्धाश्रम को हिमालय के उत्तर में अवस्थित बताया गया, जहाँ सिद्ध पुरुष तपस्या करते हैं और ब्रह्मांड के रहस्यों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। इसे शांगरी-ला से जोड़ा जाता है क्योंकि यहाँ दिव्य प्रकाश और अमरता का वर्णन मिलता है, जैसा वन पर्व में वर्णित है।आध्यात्मिक जुड़ावयह स्थान भक्ति और तपस्या का परम केंद्र है, जहाँ महाभारत के संदर्भ से साधक मोक्ष प्राप्त कर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। लोक मान्यताओं में इसे शांगरी-ला का प्राचीन रूप माना जाता है।समानता का आधारमहाभारत के सिद्धाश्रम वर्णन में रहस्यमयी रोशनी औरसमय-स्थिरता का उल्लेख शांगरी-ला की आधुनिक कथाओं से मेल खाता है।आध्यात्मिक भक्ति की वह घाटी सतलोक या अमरपुरी है, जहाँ सच्ची भक्ति करने वाला साधक एक बार पहुँचने के बाद कभी लौटकर संसार में नहीं आता। यह आदि और अंत का स्थान है, जहाँ जन्म-मरण का चक्र हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।घाटी का आध्यात्मिक महत्वशांगरी-ला जैसी रहस्यमयी घाटियाँ लोककथाओं में वर्णित हैं, लेकिन भक्ति शास्त्रों में यह सतलोक के रूप में जाना जाता है, जो परम धाम है। यहाँ समय का प्रभाव नगण्य होता है और आत्मा परम शांति प्राप्त करती है। हिंदू ग्रंथों जैसे गीता (अध्याय 15 श्लोक 4) में इसका उल्लेख मिलता है।भक्ति द्वारा प्राप्तिसच्ची भक्ति से साधक यमदूतों से मुक्त होकर इस घाटी पहुँचता है, जहाँ नाशवान संसार का अंत होता है। शास्त्रानुकूल भक्ति ही मोक्ष का द्वार खोलती है, अन्यथा 84 लाख योनियों का चक्कर चलता रहता है।आदि-अंत का रहस्ययह घाटी आदि (सृष्टि का मूल) और अंत (मोक्ष का परम पद) दोनों का प्रतीक है, सिद्धाश्रम के समान। तिब्बती और हिंदू ग्रंथों में इसे आध्यात्मिक केंद्र कहा गया है।