संत की सोहबत, उनकी नसीहत, मेहर और शिष्य को इजाजत देने की प्रक्रिया से जुड़ी महत्त्वपूर्ण बातें इस प्रकार हैं:पूर्ण संत की सोहबत (संगत) साधक के जीवन में गहरा परिवर्तन लाती है। वे अपने आचरण, नसीहत और आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से शिष्य के मन, वचन और कर्म की शक्ति को सद्गुणों की ओर मोड़ते हैं। संत की संगत से पापी भी सुधर सकता है, जैसा कि तुलसीदास जी ने रामायण में बताया कि सठ सुधरी सुसंगत पावै यानी संगत से नीच व्यक्ति भी सुधर जाता है। इस संगत में पूर्ण समर्पण और गुरु वचन की आज्ञा का ध्यान आवश्यक होता है। गुरु की कृपा से साधक के अंदर आध्यात्मिक ज्ञान और गुण उत्पन्न होते हैं जो उसे निरंतर सुधार की ओर ले जाते हैं।नसीहतें पूर्ण संत की शिक्षाएं होती हैं जिसमें शिष्य के लिए सदाचार, सच्चाई, संयम, और पवित्र जीवन मूल्यों पर जोर दिया जाता है। पूर्ण संत शिष्यों को मांसाहार, नशीले पदार्थों और असाधारण ध्यान-साधना विधियों से बचकर सरल, सहज और भक्तिपूर्ण जीवन जीने की सीख देते हैं। वे ऐसा जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देते हैं जो साधक को परमात्मा के प्रति सच्ची भक्ति और मोक्ष की ओर ले जाती है।मेहर (आशीर्वाद) पूर्ण संत के द्वारा शिष्य को दी जाती है, जो शिष्य के जीवन में दिव्यता और आध्यात्मिक प्रगति का कारण बनती है। यह मेहर साधक को कठोरायुध्र जैसे जन्म-मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त कर सकती है। सतगुरु की मेहर से साधक जीवन में आशीर्वाद और रक्षा पाता है।इजाजत (दीक्षा) पूरी संत की ओर से शिष्य को आध्यात्मिक मार्ग-निर्देशन प्राप्त करने और सतनाम जाप के मंत्र आदि का अभ्यास करने की अनुमति होती है। यह इजाजत गुरु शिष्य के संबंध का कानूनी आध्यात्मिक प्रमाण होती है, जिसके अनुसार शिष्य पूर्ण गुरु की बताई साधना का पालन करता है। पूर्ण संत वही इजाजत देते हैं जो आत्मा के उद्धार में सक्षम सही मंत्र और साधना विधि प्रदान करते हैं।इस तरह, पूर्ण संत की संगत, नसीहत, मेहर और इजाजत से साधक का जीवन आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है और वह परमेश्वर के साक्षात अनुभव एवं मोक्ष की प्राप्ति कर पाता है। पूर्ण संत की यह भूमिका शिष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि वे न केवल मार्ग दिखाते हैं बल्कि साधक को उस पर चलने के लिए आवश्यक साधन, सुरक्षा और प्रेरणा भी देते हैं

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