स्वयं के ऐक्य और ब्रह्मानुभूति के लक्षण इस प्रकार होते हैं:द्वेष, क्रोध, मोह, भय, सुख-दुख की परवाह समाप्त हो जाती है। साधक में समदृष्टि, समदुःखसुखता आती है, जो जीवन के द्वन्द्वों में भी स्थिर रहती है। वह सभी प्राणियों के प्रति मैत्र भाव रखता है, अद्वेष्टा होता है, और सबमें करुणा होती है।अहंकार, ममता, दम्भ, और असमानता का अभाव होता है। मन निर्मल, शांत और संयत होता है। ऐसे व्यक्ति में वैराग्य और आत्मविनिग्रह (मन और इन्द्रियों का नियंत्रण) होता है।स्वतंत्रता का ज्ञान होता है, जो आसक्ति, अनुराग, और शरीर, पुत्र, वस्तुओं से लगाव नहीं रखता। उसका चित्त हमेशा समान रहता है, न सुख की अति उत्सुकता न दुःख की भारी व्यथा में उलझा रहे।साधक में अनन्य भक्ति होती है, जो परमार्थी, निरपराध, और अविवेचक होती है। साधनाएँ, उपासना में भेद नहीं रहता, समर्पण पूर्ण होता है।अनुभव में वह अपने और ब्रह्म के बीच कोई भेद न देखकर सबमें एकत्व की अनुभूति करता है। उसे लगता है कि सब कुछ उसी का या उसी के स्वरूप का है।माया, जगत की अस्थिरता, जन्म-मरण, बंधन-बंधन की समझ के कारण वह निर्भय, निर्गुण, और उपलब्धि-रहित होता है।उसका ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि कर्म व जीवन में स्पष्ट और सहज अनुभूति बन जाता है। वह संसार में रहते हुए भी संसार से बंधा नहीं होता।इन सभी लक्षणों से ज्ञात होता है कि साधक ने स्वं और ब्रह्म का ऐक्य प्राप्त कर परम ब्रह्म का अनुभव कर लिया है। इसे भगवद्गीता सहित अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों में आत्मज्ञानी का स्वरूप बताया गया हैस्वयं के ऐक्य और ब्रह्मानुभूति के लक्षण इस प्रकार होते हैं:द्वेष, क्रोध, मोह, भय, सुख-दुख की परवाह समाप्त हो जाती है। साधक में समदृष्टि, समदुःखसुखता आती है, जो जीवन के द्वन्द्वों में भी स्थिर रहती है। वह सभी प्राणियों के प्रति मैत्र भाव रखता है, अद्वेष्टा होता है, और सबमें करुणा होती है।अहंकार, ममता, दम्भ, और असमानता का अभाव होता है। मन निर्मल, शांत और संयत होता है। ऐसे व्यक्ति में वैराग्य और आत्मविनिग्रह (मन और इन्द्रियों का नियंत्रण) होता है।स्वतंत्रता का ज्ञान होता है, जो आसक्ति, अनुराग, और शरीर, पुत्र, वस्तुओं से लगाव नहीं रखता। उसका चित्त हमेशा समान रहता है, न सुख की अति उत्सुकता न दुःख की भारी व्यथा में उलझा रहे।साधक में अनन्य भक्ति होती है, जो परमार्थी, निरपराध, और अविवेचक होती है। साधनाएँ, उपासना में भेद नहीं रहता, समर्पण पूर्ण होता है।अनुभव में वह अपने और ब्रह्म के बीच कोई भेद न देखकर सबमें एकत्व की अनुभूति करता है। उसे लगता है कि सब कुछ उसी का या उसी के स्वरूप का है।माया, जगत की अस्थिरता, जन्म-मरण, बंधन-बंधन की समझ के कारण वह निर्भय, निर्गुण, और उपलब्धि-रहित होता है।उसका ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि कर्म व जीवन में स्पष्ट और सहज अनुभूति बन जाता है। वह संसार में रहते हुए भी संसार से बंधा नहीं होता।इन सभी लक्षणों से ज्ञात होता है कि साधक ने स्वं और ब्रह्म का ऐक्य प्राप्त कर परम ब्रह्म का अनुभव कर लिया है। इसे भगवद्गीता सहित अनेक आध्यात्मिक ग्रंथों में आत्मज्ञानी का स्वरूप बताया गया हैइस प्रकार ऐक्य का मूल अर्थ है विभिन्न तत्वों का एक रूप या एक स्वरूप में सम्मिलित होना, जो अध्यात्मिक, दार्शनिक समेत

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