।एक साधक जब शून्य में पूरी तरह खो जाता है, तो वह केशून्य (पूर्ण शून्यता), मोह भंग (मोह का नाश) और निर्लिप्त (सर्वस्व से विमुक्त) अवस्था प्राप्त करता है। यह अध्यात्म की उच्चतम समाधि अवस्था है, जहाँ अहंकार मिट जाता है और साधक परमात्मा में लीन हो जाता है। शून्य अवस्था का स्वरूपशून्य में लीन होना ध्यान की परिपक्व अवस्था है, जहाँ मन की चंचलता समाप्त हो जाती है और साधक ‘मैं’ से परे हो जाता है। यहाँ मोह भंग होता है, अर्थात् संसार के प्रति आसक्ति टूट जाती है, और निर्लिप्तता आती है—सब कुछ देखते हुए भी कुछ से बंधा न होना। यह भगवद्गीता के निर्गुण भक्ति या अद्वैत वेदांत की निरवीकल्प समाधि जैसी है। प्राप्ति का समययह अवस्था लंबी साधना के बाद आती है, जब साधक निरंतर ध्यान, सेवा और समर्पण से अहं को गलाता है। प्रारंभ में अंतरमुखी मौन से शुरु होकर, अंत में केशून्य हो जाता है—जैसे नदी समुद्र में विलीन। 99% साधक इसे पार नहीं कर पाते क्योंकि अहंकार छोड़ना कठिन है। आध्यात्मिक महत्वइस अवस्था में साधक साधन बन जाता है; ईश्वर उसके माध्यम से कार्य करता है। जीवन चमत्कारपूर्ण हो जाता है—चिंता, भय समाप्त, शांति और आनंद बहता है। यह शून्य से अनंत का द्वार है, जहाँ मौन ही ईश्वर की वाणी बन जाता है