पिताजी साहब जब भी घर पर सत्संग होता रहा है ओर शिष्य घ्यान करने के लिए आते थे उनको एक ही बात कहते थे गुरु और शिष्य का बंधन जन्म जन्मांतर का होता है गुरु ने पूर्व ही अंतिम मुकाम पा लिया होता है और कर्म मुक्त हो शिष्य में पिछले जन्म की रही कमिया ओर कर्म का फल भुगतान करवाने ओर खराब फल को न्यून करने और शिष्य में निष्ठा भाव पैदा कर शिष्य में समर्पण और सदाचारि सहन शील ओर आत्मज्ञानी के गुण। पैदा कर लोक कल्याण के लिए आता है पर गुरु में जितनी आत्मीयता होती है उतनी शिष्य में नही होती वो शिष्य को।पूर्ण करने हेतु आता है शिष्य ये भूल जाता है उसने जन्म मुक्त होने के लिए लिया है पर संसार के मोह माया में उलझ अपने भले के लिए वह कुछ भी कर्म कर लेता है जिससे उसे भैतिक दुनिया मे लाभ हो अमीरी के भाव मे भ वो बईमानी करन ओर भौतिक सुख की लालसा में डूब जाता है जिससे उसके मन मे अविष्वास पैदा हो गुरु से दूर हो जाता है ना वो निष्पक्ष न्याय में शामिल।नही रहता ओर लोभ मोह ओर पारिवारिक कल्याण हेतु नॉकरी सेवा या व्यापार और अन्य में अपनी नियत सत्यता पर कायम नही रहता और मन मे भटकाव के कारण अपने चरित्र को सही नही रख पाता और विकार रहित होने के बजाए अविष्वास के कारण विकारो में उलझ जाता है ये बात गुरु देव सहन नही करते ओर उनको बर्दाश नही होता और गुरुबहुत सी बार स्वम् को दूर कर लेता है इधर शिष्य मोह माया के जाल में उलझ अपने को आध्यात्मिकता से दूर कर लेता है और इस जन्म।में कर्म खराब ओर होने सेन्याय नही मिलता ओर अपने जन्म के उद्देश्य से भटक जाता गयाक्योकि यहां
गुरु इस बात को।जानते है वो अब इस अवस्था मे शिष्य से आत्मिक तो नही पर भौतिकता की दूरी बना लेते है और कर्म भुगतान अच्छे या बुरे कर्म भुगतने के लिए उसे छोड़ते तो नही है पर अपनी कृपा सेवंचित या कम कर देते हैअब शिष्य निष्पक्ष जीवन नही जी पाता और माया में उलझ के भतकता रहता है और अपने जीवन को बेकार कर बुरे कर्म और अपने भाग्य के लेखे में जोड़ लेता है जिससे गुरु को उसके उद्धार करने में दिक्कत आती है और शिष्य इस जीवन मे आध्यात्मिक धेय्य को पाने से वंचित रह जाता है गुरु जानते है 100 में से 5 या 6 शिष्य ही आध्यात्मिक मुकाम को पा लेते है अन्य नही इसके अलावा घमण्ड के कईं वो जो शिष्य उच्च मुकाम पर पहुच गए है उनसे भी ज्ञान और कृपा पा नही पाता अपने झूटी शान शौकत में जीवन गंवा देता है

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