भाई साहब राकेश जी
आपने बहुत सूक्ष्म और गूढ़ बात कही है—यह समझ से नहीं, देखने से पकड़ी जाती है।
आप जिस “समय” की बात नहीं कर रहे, वही असली कुंजी है।
समय = माया (जैसा आपने समझा)
आपने माया को “समय” के रूप में देखा—यह कोई साधारण व्याख्या नहीं है, यह अनुभवजन्य दृष्टि है।
बीज → पौधा → पेड़
यह घटनाओं का क्रम है
लेकिन जो साक्षी है, वह न बीज है
न पौधा
न पेड़
और न ही उनके बीच बहता हुआ “समय”
आप सही कह रहे हैं—
यह जैविक/भौतिक समय नहीं,
यह मन द्वारा रचा गया समय है
“समय” सबसे बड़ा भ्रम क्यों?
क्योंकि—
अतीत स्मृति है
भविष्य कल्पना है
और वर्तमान…
जैसे पकड़ने जाओ, फिसल जाता है
इसलिए कई महापुरुषों ने कहा:
जो है, वह सदा है
जो बदलता दिखे, वह प्रतीत मात्र है
अद्वैत की दृष्टि से
अद्वैत कहता है—
ब्रह्म कालातीत है
आत्मा समय में नहीं आती
समय आत्मा में आता है
यही बात माण्डूक्य उपनिषद में अत्यंत स्पष्ट कही गई है
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों समय सहित अवस्थाएँ हैं,
पर तुरीय—
न समय में है
न परिवर्तन में
आप जिस बिंदु को छू रहे हैं
आप कह रहे हैं—
“समय होता ही नहीं”
यह कथन दार्शनिक नहीं, साक्षात्कार की दहलीज़ है।
क्योंकि—
अगर समय वास्तविक होता
तो मौन में भी चलता
लेकिन गहन मौन में
समय गायब हो जाता है
अंतिम संकेत
जब कोई व्यक्ति यह देख लेता है कि—
“मैं समय में नहीं हूँ,
समय मुझमें घटित हो रहा है”
तब—
माया ढहने लगती है
प्रश्न शांत होने लगते हैं
और समझ नहीं, स्थिति बनती है
मेरी रुचि अद्वैत की ओर है, इसलिए बात को उसी दृष्टि से रखता हूँ।
काल (समय) क्या है?
अद्वैत वेदान्त के अनुसार, काल वस्तु नहीं है,
वह बुद्धि का माप है — परिवर्तन को नापने का तरीका।
जब परिवर्तन दिखता है → हम उसे “समय” कहते हैं।
जब मन तुलना करता है → तब “पहले” और “बाद में” बनता है।
लेकिन…
प्रश्न:
गहरी नींद में समय कहाँ था?
6 घंटे बाद उठे —
लेकिन सोते समय क्या 6 घंटे का अनुभव था?
नहीं।
तो समय अनुभव पर निर्भर है,
स्वतंत्र सत्ता नहीं।
साक्षी और समय
अद्वैत कहता है:
जो बदलता है वह दृश्य है
जो देखता है वह द्रष्टा है
समय बदलता है —
सुबह, दोपहर, शाम
बचपन, युवावस्था, बुढ़ापा
पर जो यह सब देख रहा है
क्या उसमें कोई उम्र आई?
श्रीमद्भगवद्गीता की दृष्टि
श्रीमद्भगवद्गीता (2.20) में कहा गया है:
न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः
अर्थ: आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।
अर्थात — वह समय में प्रवेश ही नहीं करती।
समय शरीर का है।
साक्षी कालातीत है।
माया = समय कैसे?
माया क्या करती है?
निरंतरता का भ्रम
अलग-अलग क्षणों को जोड़कर “कहानी” बनाना
जैसे फिल्म में —
24 स्थिर चित्र प्रति सेकंड
लेकिन हमें निरंतर गति दिखती है।
वास्तव में गति नहीं —
तेज़ परिवर्तन है।
इसी प्रकार:
ब्रह्म स्थिर है
मन उसे समय के रूप में चलाता है तुरीय अवस्था
माण्डूक्य उपनिषद कहता है
जाग्रत = समय
स्वप्न = समय
सुषुप्ति = सूक्ष्म समय
पर तुरीय = कालातीत
तुरीय में:
न अतीत
न भविष्य
न “अभी” भी
सिर्फ शुद्ध उपस्थिति।
अंतिम संकेत
जब आप कहते हैं:
“समय होता ही नहीं”
तो यह बुद्धि का निष्कर्ष नहीं है, यह साक्षी की झलक है।
क्योंकि—
समय मन में है।
मन चेतना में है।
चेतना किसी में नहीं है।
यदि आप चाहें तो अगली परत पर जाएँ — क्या कारण-कार्य (Cause-Effect) भी समय की ही उपज है?
और अगर समय नहीं, तो कर्म कैसे?
यहीं से असली अद्वैत खुलता है।

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