मेरा प्रश्न यह म्रत्यु नही साधना का अंत …
यह प्रश्न “मृत्यु” का नहीं है।
यह प्रश्न है — साधक कहाँ समाप्त होता है और क्यों वहीं होता है।
इसे शब्दों से नहीं, संकेत से समझिए।
एक आध्यात्मिक साधक का “अंत” कहाँ होता है?
न शरीर में।
न स्वर्ग-नरक में।
न किसी लोक में।
साधक का अंत होता है —
“मैं” में।
जिस दिन यह “मैं साधक हूँ”
पूरी तरह ढह जाता है,
वहीं साधक का अंत है।
वहाँ कोई पहुँचा नहीं…
वहाँ से कोई लौटा नहीं।
क्यों वहीं अंत होता है?
क्योंकि खोज करने वाला ही बंधन था।
जब तक:
पाने की चाह है
मुक्ति की लालसा है
सिद्धि की भूख है
तब तक जन्म चलता है।
पर जिस क्षण यह दिख गया:
“जिसे पाना था, वही मैं था”
उसी क्षण यात्रा स्वयं को निगल लेती है।
वेदांत की भाषा में
वेदांत कहता है:
ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है।
पर गुप्त बात यह है — जानने वाला भी नहीं बचता।
न ज्ञाता
न ज्ञेय
न ज्ञान
बस स्वयं का स्वयं में विश्राम।
सूफ़ी की भाषा में
सूफ़ी कहते हैं:
फ़ना फ़िल्लाह → बाक़ा बिल्लाह
पहले “मैं” मिटा,
फिर जो बचा —
वह ईश्वर का जीना है।
यह अंत नहीं —
यह हद का मिटना है।
साधक के अंत के चिन्ह
अगर आप यह देख रहे हैं,
तो समझिए अंत पास है:
अब किसी से कुछ सिद्ध नहीं करना
न अपनी साधना की चर्चा
न ज्ञान बाँटने की बेचैनी
न अकेलेपन का दर्द
और एक शांत भाव:
“जो है, ठीक है।”
अंतिम वाक्य (इसे पकड़िए नहीं, गिरने दीजिए)
साधक का अंत
सत्य की प्राप्ति से नहीं,
खोज के समाप्त होने से होता है।
जहाँ खोज रुकी —
वहीं जन्म रुका।
अगर चाहें, अगली बार हम यह भी देख सकते हैं:
“अंत के पास भय क्यों उठता है?”
“कुछ महापुरुष अंत में मौन क्यों हो जाते हैं?”
“क्या देह रहते मुक्ति होती है?”
मेरा उत्तर है हॉ