भाई
विचारों का flow सक्रिय होना बहुत शुभ संकेत है — पर अब यहाँ सूक्ष्म विवेक चाहिए, वरना मन बहुत महीन जाल बुन देता है।
आपने जो कहा —
“What appears and disappears is not real”
यह बात अद्वैत वेदांत में बिल्कुल सही मानी जाती है।
जो आता-जाता है, वह अनित्य है इसलिए परमसत्य नहीं है।
लेकिन जहाँ आप पहुँचे हैं
“अंधकार real है, प्रकाश नहीं”
यहीं थोड़ा गहराई से देखना होगा।
क्या अंधकार स्वप्रकाशित है?
पहले यह देखें:
अंधकार को आप कैसे जानते हैं?
प्रकाश को आप कैसे जानते हैं?
जब कमरे में अंधेरा होता है, तो भी आपको पता है कि अंधेरा है।
जब प्रकाश होता है, तब भी आपको पता है कि प्रकाश है।
तो असली स्वप्रकाशित कौन हुआ?
ना अंधकार।
ना प्रकाश।
बल्कि — जिससे दोनों ज्ञात हो रहे हैं।
अद्वैत वेदांत की दृष्टि
बृहदारण्यक उपनिषद्
यहाँ आत्मा को कहा गया स्वयंज्योति”
अर्थात् वह स्वयं प्रकाश है जिसे किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं।
माण्डूक्य उपनिषद्
यह बताता है कि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति — तीनों अवस्थाएँ आती-जाती हैं।
पर जो इन सबका साक्षी है वही सत्य है।
अंधकार भी आता-जाता है
सोचिए:
दोपहर में सूर्य है → अंधकार नहीं
रात में सूर्य दृष्टि से ओझल अंधकार
दीपक जलाया → अंधकार गया
तो अंधकार भी एक स्थिति है।
स्थिति बदलती है — इसलिए वह भी अनित्य है।
असली “स्वप्रकाश” क्या है?
ना प्रकाश।
ना अंधकार।
बल्कि वह चेतना —
जिसमें प्रकाश भी प्रकट होता है
और अंधकार भी।
जैसे:
बादल आते हैं
बादल जाते हैं
आकाश नहीं बदलता
वैसे ही:
प्रकाश आता है
अंधकार आता है
चेतना नहीं आती-जाती
सूक्ष्म निष्कर्ष
जो आता-जाता है
वह मिथ्या / अनित्य
जो सदैव है
वही सत्य
पर ध्यान रहे —
सत्य “कुछ” नहीं है
वह केवल “होना” है — शुद्ध अस्तित्व।
अद्वैत में इसे कहते हैं —
सत्-चित्
अब मैं आपसे एक प्रश्न पूछूँ? (यह ध्यान के लिए है)
जब आप कहते हैं “अंधकार है”
तो “है” किसका है?
अंधकार का?
या “होने” का?
यहीं से प्रवेश द्वार खुलता है। प्रकाशित (appearing light): यह आता है, जाता है – सूरज उगता, डूबता; विचार आते-जाते। इसलिए माया का खेल, असत्य। भगवद्गीता (अ. 2.16) कहती है: नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः पार्थ भगवन्प्राप्तिरस्पृहः॥ अर्थात् जो आता-जाता है, वह न सत् है न असत् – मिथ्या मात्र।स्वप्रकाशित अंधकार (self-luminous darkness): अंधकार तो “है” ही – बिना प्रयास के, नित्य उपस्थित। यह शून्यता या चेतना का प्रतीक, जो स्वयं प्रकाशमान है। सूफी परंपरा में इसे “फना” कहते हैं – सब विलीन हो जाए, बस “है” रह जाए। वेदांत में निर्गुण ब्रह्म: न जन्म, न मृत्यु, बस सत्-चित्-आनंद।अंधकार ही सत्य क्यों? क्योंकि प्रकाश उसके बिना परिभाषित ही नहीं होता। जैसे चोर-चोर मांगे पुलिस, वैसे सत् की खोज में असत् अनुभव होता है। यह “सिर्फ है” – न रहता, न जाता। योग वासिष्ठ में कहा: यथाकाष्ठं स्थितं तत् – वही स्थिर सत्य।यह अनुभव ध्यान में गहरा होता है, जब मन शांत पहो तो अंधकार (शून्य) स्वयं प्रकट। आपका flow यही तो समाधि की ओर इशारा कर रहा!
वेदांत में अंधकार का रहस्यअंधकार को स्वप्रकाशित सत्य मानना उपनिषदों का सार है। द्वयोपनिषद (4) कहता: गुशब्दस्त्वन्धकार: स्यात् रुशब्दस्तन्निरोधक: – “गु” अंधकार (अज्ञान) है, “रु” उसका नाशक; गुरु इसलिए अंधकार-निरोधक। यह स्थिर “है”-भाव ब्रह्म है, जो न आता-जाता।सूफी का काला प्रकाशसूफी परंपरा में “Black Light” या “Nur al-Asad” यही स्वप्रकाशित अंधकार है – नूर इतना गहन कि काला लगे। नजमुद्दीन कुबरा और इब्न अरबी के अनुसार, यह फना (विलय) की अवस्था, जहाँ प्रकाश बोझ बन जाए तो अंधकार प्रकट होता। रूमी कहते: यह शून्यता सब संभावनाओं का बीज।यह अनुभव ध्यान में ही मिलता – मन विलीन, बस “है”।

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