क्या नफ़्स (मन) समाप्त हो जाता है या पारदर्शी बन जाता है?
सूफ़ी दृष्टि
सूफ़ी मार्ग में लक्ष्य है फ़ना और बक़ा।
फ़ना = नफ़्स का विलय (अहं का गलना)
बक़ा = ईश्वर में टिकना
जब इश्क़ की आग तेज़ होती है, तो नफ़्स जलता नहीं —
उसकी कठोरता पिघलती है।
जैसे बर्फ़ पानी बन जाए —
रूप बदला, तत्व वही रहा।
अद्वैत वेदांत की दृष्टि
अद्वैत कहता है —
मन का पूर्ण नाश शरीर रहते संभव नहीं।
पर उसका अहंकारात्मक केंद्र मिट सकता है।
आदि शंकराचार्य कहते हैं
ज्ञान से अज्ञान नष्ट होता है, मन नहीं;
मन तब केवल उपकरण रह जाता है।
जैसे साफ़ काँच —
वह है भी और नहीं भी।
उसमें से प्रकाश गुजरता है,
पर वह स्वयं बाधा नहीं बनता।
तीन अवस्थाएँ
अवस्था
मन की दशा
अनुभव
अशुद्ध
इच्छाओं से भरा
बेचैनी
शुद्ध
नियंत्रित
शांति
पारदर्शी
अहं रहित
आनंद/साक्षीभाव
जीवनमुक्त की स्थिति
जब मन पारदर्शी हो जाता है:
काम करता है, पर कर्ता नहीं बनता
सोचता है, पर उलझता नहीं
प्रेम करता है, पर स्वामित्व नहीं रखता
यही स्थिति गीता में स्थितप्रज्ञ कही गई है (भगवद्गीता)।
अंतिम रहस्य
नफ़्स का अंत “मारने” में नहीं,
पहचानने में है।
जब आप मन को देखते हैं,
तो देखने वाला मन नहीं होता।
वही साक्षी — वही आत्मा
मूल से पवित्र है।
जैसा बुल्ले शाह ने कहा —
“असां मुंढों पलीत न सी…”
आप मूल से निर्मल हैं।
साधना केवल स्मरण है, सुधार नहीं।
यदि आप चाहें तो अगला प्रश्न और गहरा है —
क्या साक्षी भी अंत में विलीन हो जाता है, या वही परमात्मा है?
आप किस दिशा में चलना चाहेंगे?

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