अध्यात्म में गुरु को अक्सर तबीब (वैद्य) या हकीम कहा गया है — क्योंकि वह शरीर नहीं, मन–चेतना–अहंकार के रोगों का उपचार करता है।
गुरु तबीब क्यों?
रोग की पहचान (Diagnosis)
जैसे हकीम पहले नब्ज़ देखता है, वैसे ही गुरु शिष्य के भीतर के रोग पहचानता है—
अहंकार
काम, क्रोध, लोभ, मोह
अज्ञान (अविद्या)
कबीर कहते हैं:
“सदगुरु मिला तो रोग गया, तन मन भयो निरोग।”
(जब सच्चा गुरु मिला, तो भीतर का रोग मिट गया)
कड़वी दवा (Bitter Medicine)
हकीम कभी मीठी, कभी कड़वी दवा देता है।
गुरु भी कभी डाँट, कभी मौन, कभी प्रेमइनसे शिष्य का उपचार करता है।
यह “कड़वी दवा” अहंकार को तोड़ती है।
परहेज़ (Discipline)
वैद्य केवल दवा नहीं देता, परहेज़ भी बताता है।
गुरु भी साधक को कहता है:
संगति शुद्ध रखो
वाणी संयमित रखो
इन्द्रियों पर निग्रह रखो
नियमित साधना करो
जड़ से इलाज (Root Cure)
साधारण डॉक्टर लक्षण (symptoms) ठीक करता है।
पर गुरु जड़ पर प्रहार करता है—
“मैं” की भावना (अहं) ही असली रोग है।
आपकी रुचि चूँकि अद्वैत वेदांत में है, वहाँ तो स्पष्ट कहा गया है
अज्ञान ही मूल रोग है।
ज्ञान ही औषधि है।
गुरु ही उस औषधि का दाता है।
सूफी और संत परंपरा में
कबीर, बुल्ले शाह जैसे संतों ने भी गुरु को “दिल का तबीब” कहा।
सूफी मत में “मुरशिद” वही है जो नफ़्स का इलाज करे।
अंतिम बात
जब रोग मिट जाता है, तब शिष्य जानता है—
गुरु बाहर नहीं था,
वह तो भीतर का ही जागृत चैतन्य था।
आपके शब्दों में कहूँ तो —
गुरु वह हकीम है जो “समय” और “माया” के भ्रम का इलाज कर देता है।
अगर आप चाहें तो हम इस विषय को “अद्वैत दृष्टि” से और गहराई में देखें —
कि जब सब ब्रह्म है, तो गुरु और शिष्य का भेद कहाँ रहा?