शिष्य नाव पतवार गुरु कप्तान ओर मलल्लाह ईश्वर रूपी समुंदर को।पार गुरु ले जाता चाहे भीषण तूफान आये शिष्य को।पार करवाता है
मेरा यह विचार मन मे आया मुझे लगा यह बहुत सुंदर है ओर कुछ गयं वर्धक इसीलिए इसे लिखाओर ये मेरे मन मे आया एक — और हृदय को छू लेने वाला विचार है।
शिष्य = नाव
श्रद्धा/साधना = पतवार
गुरु = कप्तान/मल्लाह
ईश्वर = समुंदर
इसे थोड़ा गहराई से देखते हैं।
जीवन रूपी समुंदर
यह समुंदर क्या है?
जन्म–मरण
सुख–दुःख
मोह–माया
अहंकार की लहरें
जब तूफ़ान आता है —
मतलब परिस्थितियाँ, वासनाएँ, भय, भ्रम।
शास्त्र की पुष्टि
श्रीमद्भगवद्गीता (4.36)
भगवान कहते हैं —
ज्ञान रूपी नाव से तू पापों के सागर को पार कर जाएगा।
और (4.34) में —
तत्त्वदर्शी गुरु के पास जाओ, प्रश्न करो, सेवा करो वे ज्ञान देंगे।
यहाँ गुरु दिशा देते हैं,
पर नाव शिष्य को ही संभालनी होती है।
गुरु की भूमिका
गुरु:
दिशा जानते हैं
तूफ़ान में स्थिर रहते हैं
डरते नहीं
पर एक गहरा रहस्य है
गुरु पार नहीं करवाते —
गुरु दिखाते हैं कि तू पहले से ही जल है।
अद्वैत की दृष्टि
समुंदर भी वही
नाव भी वही
कप्तान भी वही
चेतना एक है।
जब तक शिष्य स्वयं को नाव मानता है,
गुरु आवश्यक हैं।
जब वह जान लेता है कि वह जल ही है —
तब पार और अपार का भेद मिट जाता है।
सूक्ष्म सत्य
तूफ़ान कभी समुंदर को डुबो नहीं सकता।
नाव डगमगा सकती है,
पर जल को कुछ नहीं होता।
अगर तुम स्वयं को नाव समझते हो —
डर होगा।
अगर स्वयं को जल जान लो
तूफ़ान भी तुममें ही उठता और शांत होता है।
भाई साहब जी
अब एक शांत प्रश्न मन मे आता है क्या शिष्य सच में पार कर मुक्क्त होना चाहते है
या यह जानना है कि आप कभी डूबे ही नहीं?
भाई साहब जी 🙏
तो अब बात बहुत सीधी है…
अगर आप सच में जानना चाहते हैं कि “मैं कभी डूबा ही नहीं” —
तो अब प्रतीक छोड़कर सीधा अनुभव की ओर चलते हैं।
पहले स्पष्ट कर लें
अब तक रूपक था:
शिष्य = नाव
गुरु = मल्लाह
ईश्वर = समुंदर
पर अब प्रश्न है —
अभी इस क्षण आप कौन हैं?
नाव?
लहर?
या जल?
एक छोटा सा आंतरिक प्रयोग
अभी शांत बैठिए 30 सेकंड।
एक विचार उठेगा
वह चला जाएगा
दूसरा आएगा
वह भी जाएगा
विचार = लहर
मन = हवा
पर…
जिसे यह सब दिखाई दे रहा है
क्या वह भी आ-जा रहा है?
तूफ़ान कहाँ उठता है?
ऊपर लहरें हैं।
गहराई में शांति है।
क्या आपने कभी समुद्र की गहराई देखी है?
ऊपर कितना भी तूफ़ान हो
नीचे स्थिरता रहती है।
आपका वास्तविक स्वरूप वही गहराई है।
अद्वैत की अंतिम दिशा
अष्टावक्र गीता
अष्टावक्र कहते हैं:
“तू सागर है,
संसार लहर मात्र है।”
इसका अर्थ है:
पार जाना नहीं है
पहचानना है अब सबसे सूक्ष्म प्रश्न
क्या कभी आपने अपने “होने” को डूबते देखा है?
दुख आता है
शरीर बदलता है
विचार बदलते हैं
पर “मैं हूँ” —
यह बदलता है क्या?
अब गुरु की नाव की आवश्यकता कम होने लगती है।
क्योंकि जहाँ आप खड़े हैं
वही किनारा है।
अब बताइए —
इस क्षण आप लहर महसूस हो रहे हैं
या सागर?

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