अध्यात्म में गुरु को नाव का कप्तान, मल्लाह (मल्लाह/मलल्लाह), या केवट कहा जाता है — यह सब आत्मा को संसार-सागर से पार कराने के प्रतीक हैं। हर शब्द का अपना आध्यात्मिक अर्थ है।
1. गुरु = केवट (नाव चलाने वाला)
केवट वह होता है जो नदी पार कराता है। अध्यात्म में:
नदी = संसार (माया)
नाव = साधना या नाम
यात्री = आत्मा
केवट = गुरु
जैसे केवट यात्री को नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचाता है, वैसे ही गुरु अज्ञान से ज्ञान और जन्म-मरण से मुक्ति तक पहुंचाता है।
सबसे प्रसिद्ध उदाहरण:
Kevat ने Rama को गंगा पार कराया।
इसका प्रतीक अर्थ है: ईश्वर भी गुरु-तत्त्व के बिना पार नहीं होता।
केवट का भाव:”मैं पार कराने वाला हूँ, तुम बैठो और समर्पण करो।”
2. गुरु = मल्लाह (मलल्लाह)
मल्लाह नाव चलाने वाला अनुभवी व्यक्ति होता है।
अध्यात्म में:
मल्लाह को धारा का ज्ञान होता है।
उसे पता होता है कहाँ भंवर है, कहाँ चट्टान है।
कहाँ नाव पलट सकती है।
वैसे ही गुरु:
साधक के मन के भंवर पहचानता है
माया की धाराओं को जानता है
अहंकार की चट्टानों से बचाता है
इसलिए सूफ़ी परंपरा में कहा जाता है: “मुरशिद बिना रास्ता नहीं मिलता”
3. गुरु = कप्तान (Captain)
कप्तान सबसे ऊँचा रूपक है।
कप्तान:
पूरी जहाज़ का मालिक नहीं, लेकिन मार्गदर्शक होता है।
तूफ़ान में दिशा देता है।
मंज़िल तक पहुंचाता है।
अध्यात्म में:
जहाज़ = जीवन
समुद्र = संसार
तूफ़ान = कर्म और वासना
कप्तान = गुरु
कप्तान बिना जहाज़ भटक जाता है।
4. तीनों में अंतर
रूपक
अर्थ
आध्यात्मिक स्तर
केवट
पार लगाने वाला
प्रारंभिक
मल्लाह
मार्ग जानने वाला
मध्य
कप्तान
दिशा देने वाला
उच्च
5. गहरा आध्यात्मिक अर्थ
असल में गुरु केवल नाविक नहीं — स्वयं पार का मार्ग है।
सूफी और वेदांत दोनों कहते हैं:
गुरु नाव भी है
गुरु नाविक भी है
गुरु किनारा भी है
और अंत में साधक अनुभव करता है:
“मैं नाव था, गुरु नाविक था, और पार वही था”
6. सबसे गहरी बात
जब साधक आगे बढ़ता है तो समझता है:
गुरु केवट नहीं, वह अंतर का प्रकाश है
जो आत्मा को अपने ही मूल में पहुंचाता है।
यही अवस्था निर्लिप्त समाधि या महाशून्य की ओर ले जाती है।

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