आपके पिता का कथन बहुत गहरे आध्यात्मिक अनुभव की ओर संकेत करता है। वास्तव में कई आध्यात्मिक परम्पराओं में कहा गया है कि राजयोग मन और चित्त की पूर्ण स्थिरता तक ले जाता है, और उसके बाद अनाहद योग (नाद योग) साधक को महाशून्य या परब्रह्म अनुभव तक पहुँचा सकता है। यह ज्ञान प्रायः पुस्तकों से अधिक गुरु-परम्परा से मिलता है।
राजयोग की सीमा (जहाँ मन शांत हो जाता है)
राजयोग में साधक:
चित्तवृत्ति निरोध (मन की तरंगें शांत) करता है
ध्यान और समाधि तक पहुँचता है
इन्द्रियों पर नियंत्रण (नवद्वार पर अधिकार) प्राप्त करता है
कभी-कभी सहस्त्रार या दशम द्वार की अनुभूति होने लगती है
इस अवस्था में साधक को शांति और समाधि मिलती है, पर अभी सूक्ष्म यात्रा पूरी नहीं होती।
अनाहद योग की शुरुआत (नाद की साधना)
जहाँ राजयोग समाप्त माना जाता है, वहाँ से अनाहद योग या नाद योग प्रारम्भ होता है।
इस अवस्था में साधक:
भीतर अनाहद नाद (बिना टकराहट की ध्वनि) सुनता है
ध्यान स्वाभाविक हो जाता है
आंतरिक प्रकाश और ध्वनि का अनुभव होता है
चेतना ऊपर की ओर खिंचती है
संत परंपरा कहती है:
“पहले ज्योति, फिर नाद, फिर शून्य।”
महाशून्य की अवस्था
अनाहद योग साधक को आगे ले जाकर महाशून्य तक पहुंचा सकता है।
महाशून्य में:
मन लगभग समाप्त हो जाता है
अहंकार मिट जाता है
समय और स्थान का भान कम हो जाता है
साधक शून्य में स्थिर रहता है
यह अवस्था:
निर्विकल्प समाधि के निकट मानी जाती है
ब्रह्मज्ञान का द्वार हो सकती है
गुरु से मिलने वाला गुप्त ज्ञान
आपने सही कहा — यह ज्ञान अधिकतर गुरु से मिलता है।
क्योंकि:
पुस्तक दिशा देती है
गुरु अनुभव देता है
गुरु आंतरिक मार्ग खोलता है
अध्यात्म में कहा गया है:
“पुस्तक बताती है मार्ग, गुरु चलाता है।”
गहरी बात
सच्चे योगी कहते हैं:
राजयोग मन की शांति
अनाहद योग → आत्मा की यात्रा
महाशून्य → अस्तित्व का विलय
और उसके बाद: शून्य के पार ब्रह्म का अनुभव होता है।
आपके पिता की बात वास्तव में अनुभवजन्य आध्यात्मिक ज्ञान जैसी लगती है, जो संतमत, सूफी और योग – तीनों परम्पराओं में मिलता है।
अगर आप चाहें तो मैं बता सकता हूँ — महाशून्य और ब्रह्मज्ञान में क्या अंतर है — यह बहुत गहरी बात

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