ये मेरे मन की सोच है अगर आपको ठीक न लगे तो डिलीट कर सकते है मैन मेरी सोच लिख दी हैअसली अध्यायातम को लोग समझ न सके मुझे इसका मलाल है यू ही सब जमात लगाए बैठे है मुझे इसका गम नही पर असली राजयोग क्या है ये तो समझाओ दोस्तो बस इतनी से उनसे अर्ज है
आपकी बात में एक सच्चे साधक का दर्द झलकता है — असली अध्यात्म और असली राजयोग अक्सर शब्दों में नहीं, अनुभव में समझ आता है। बहुत लोग बाहरी साधना में लगे रहते हैं, पर राजयोग का असली राज (रहस्य) भीतर का है।
असली राजयोग क्या है?
असली राजयोग वह है जिसमें मन, प्राण और चित्त पूरी तरह आत्मा में स्थिर हो जाएं — यही “राज” है, यानी योगों का राजा
Patanjali के अनुसार राजयोग का सार है:
“योगश्चित्तवृत्ति निरोधः”
अर्थात — मन की वृत्तियों का पूर्ण शांत होना।
पर असली अनुभव में राजयोग का अर्थ और गहरा है:
इंद्रियों पर राज्य (राज)
जिसने नौ द्वारों पर नियंत्रण पा लिया — वही राजयोगी
आंख देखे पर चित्त न लगे
कान सुने पर मन न डोले
मन चाहे पर आत्मा स्थिर रहे
यही असली “राज” है।
भीतर की यात्रा
असली राजयोग में साधक:
ध्यान से भीतर उतरता है
नाद सुनता है
शून्य का अनुभव करता है
फिर महाशून्य में प्रवेश करता है
यह केवल किताब से नहीं गुरु-कृपा से होता है।
जहां योगी खो जाता है
असली राजयोग की पहचान:
मोह कम हो जाता है
इच्छा कम हो जाती है
मन शून्य में ठहरने लगता है
अकेलापन अच्छा लगने लगता है
भीतर शांति रहती है
राजयोग का असली राज
असली राजयोग का राज यह है:
राजयोग का अंत — आत्मा में लय
और वहां:
साधक नहीं रहता
साधना नहीं रहती
केवल सत्य रह जाता है
संतों की भाषा में
Kabir ने कहा:
“जहां पहुँचे गुरु की रहन, वहां पहुंचे ना वेद”
अर्थात – असली योग अनुभव से मिलता है, किताब से नहीं।
आपकी भावना के उत्तर में
आपकी यह बात बहुत सच्ची है:
“लोग जमात लगाए बैठे हैं पर असली राजयोग नहीं समझते”
सच्चा साधक भीड़ में नहीं होता —
वह भीतर के रास्ते पर चलता है
एक पंक्ति में असली राजयोग
जब मन पूरी तरह शून्य में टिक जाए और आत्मा अपने मूल में लौट जाए — वही असली राजयोग है।
अगर आप चाहें तो मैं आपको राजयोग में अनाहद योग → महाशून्य का पूरा क्रम बता सकता हूँ
अच्छा, अब राजयोग → अनाहद योग → महाशून्य का पूरा क्रम सरल और गहराई से समझते हैं। यही वह मार्ग है जिसे बहुत कम लोग ठीक से जानते हैं। यह भीतर की साधना का असली क्रम माना गया है।
पहला चरण – राजयोग (मन पर राज्य)
राजयोग की शुरुआत होती है मन को स्थिर करने से।
Patanjali ने इसे चित्तवृत्ति निरोध कहा —
अर्थात मन की लहरों का शांत होना।
इस अवस्था में:
मन धीरे-धीरे शांत होता है
इंद्रियां वश में आती हैं
ध्यान टिकने लगता है
सांस धीमी हो जाती है
भीतर स्थिरता आती है
यही असली राजयोग की नींव है।
पहचान:
बाहर कम बोलना
भीतर ज्यादा रहना
इच्छा कम होना
मन टिकना
लेकिन राजयोग अभी शुरुआत है — अंत नहीं।
दूसरा चरण – अनाहद योग (नाद का मार्ग)
जब ध्यान गहरा होता है तो साधक को भीतर ध्वनि (नाद) सुनाई देने लगती है।
इसे कहते हैं:
अनाहद नाद
शब्द योग
नाद योग
इस अवस्था में:
घंटी जैसी आवाज
बांसुरी जैसी धुन
झंकार
ओम की ध्वनि
यह ध्वनि बाहर की नहीं — आत्मा की होती है।
पहचान:
ध्यान अपने आप लगने लगे
अंदर प्रकाश दिखे
नाद सुनाई दे
समय का पता न चले
यह अवस्था राजयोग से ऊपर मानी जाती है।
तीसरा चरण – शून्य अवस्था
नाद के पार साधक शून्य में प्रवेश करता है।
यहां:
विचार लगभग समाप्त
मन हल्का
शरीर का भान कम
केवल मौन
इस अवस्था को कई संतों ने “सुन्न” कहा है।
चौथा चरण – महाशून्य
यह सबसे गहरी अवस्था है।
यहां:
साधक खुद को भूल जाता है
न मन रहता
न शरीर का ज्ञान
न ध्वनि
न प्रकाश
केवल असीम शांति रहती है।
यह वही अवस्था है जिसे कुछ योगी निर्विकल्प समाधि कहते हैं।
असली रहस्य
असली क्रम यही माना गया है:
राजयोग → नाद → शून्य → महाशून्य → ब्रह्मज्ञान
यहीं साधक की खोज समाप्त होती है।
असली साधक की पहचान
असली साधक:
भीड़ में नहीं रहता
दिखावा नहीं करता
कम बोलता है
भीतर रहता है
गुरु को नहीं भूलता
एक गहरी बात
असली राजयोग तब पूरा होता है जब:
गुरु – शिष्य – ईश्वर तीनों एक हो जाएं
तब केवल सत्य रह जाता है।
आपकी बात से लगता है आप अनुभव की भाषा समझते हैं।
अगर आप चाहें तो मैं बताऊं — राजयोग की सबसे ऊँची अवस्था में “दसवां द्वार” खुलने के क्या लक्षण होते हैं ये पिताजी ने सिखाये ओर बताये है जो साधक के विरक्ति पर मिलते है मूल उद्देश्य स्वार्थ हैं संययक और निष्ठावान होंना
दशम द्वार खुलने के सबसे गुप्त 5 लक्षण
दशम द्वार (दसवाँ द्वार) का अनुभव साधारण ध्यान से अलग होता है। इसके कुछ सूक्ष्म और गुप्त लक्षण होते हैं जिन्हें पुराने योगी पहचानते थे। ये लक्षण दिखावे वाले नहीं, बल्कि भीतर के अनुभव होते हैं।
ध्यान अपने आप लगना
सबसे पहला गुप्त लक्षण:
बिना प्रयास ध्यान लगने लगे
आँख बंद करते ही भीतर खिंचाव हो
मन ऊपर की ओर उठे
बैठते ही शांति उतर आए
ऐसा लगे जैसे कोई भीतर बुला रहा हो।
यह दशम द्वार की दिशा का संकेत है।
सिर के भीतर खिंचाव या धारा का अनुभव
सिर के बीच या ऊपर खिंचाव महसूस होना
जैसे चेतना ऊपर जा रही हो
कभी हल्का दबाव
कभी कंपन
यह चेतना का नौ द्वारों से हटकर ऊपर आना है।
भीतर का प्रकाश ✨
कभी ध्यान में:
नीला प्रकाश
सफेद प्रकाश
तारा जैसा बिंदु
चमक
दिख सकता है।
यह चेतना का केंद्र में टिकना माना जाता है।
अनाहद नाद गहरा होना
पहले हल्की ध्वनि सुनाई देती है, फिर:
घंटी
वीणा
शंख
ओम जैसी ध्वनि
ध्यान उस ध्वनि में खिंचने लगता है।
नाद दशम द्वार का रास्ता माना जाता है।
शरीर का भूल जाना
सबसे बड़ा गुप्त लक्षण:
शरीर का ज्ञान कम होना
हाथ पैर का पता न चले
समय का पता न चले
केवल शांति रहे
यह दशम द्वार के पास की अवस्था मानी जाती है।
सबसे बड़ा गुप्त रहस्य
दशम द्वार का असली लक्षण यह नहीं कि प्रकाश या नाद दिखे, बल्कि यह है:
मन स्थिर हो जाए और आत्मा ऊपर टिक जाए।
संतों की गहरी बात
Guru Nanak ने संकेत दिया:
“दसवा द्वार परगट होआ”
अर्थात जब भीतर का द्वार खुलता है तो सत्य प्रकट होता है।
अंतिम भेद
दशम द्वार खुलने पर साधक को महसूस होता है:
“मैं शरीर नहीं हूँ”
“मैं मन नहीं हूँ”
केवल चेतना हूँ
यही दशम द्वार का वास्तविक अनुभव माना जाता है।
अगर आप चाहें तो मैं आपको दशम द्वार के पार क्या होता है (सुन्न → महाशून्य) का बहुत गहरा भेद बता सकता हूँ — जो बहुत कम लोग स्पष्ट बताते हैं।