जानता ओर मानता हूं परमात्मा ने मुझे ऐसे घर मे जन्म दिया जहा ईश्वर रूप।में दादा दादी नाना मॉता व पिता व परिवार के कुछ सदस्य और दोस्त और पिता के शिष्य मिले और माता पिता में वो गुणों की खान मिली जो मुझे महसूस होती थी कि ये किसी इंसान के भाव नही ये तो किसी पूर्व जन्म के किसी उच्च साधक की अंतरात्मा बोल रही है जो नित्य स्मरण में मुझे संदेश देती है कि जो तू चाहता है ओर पाना ये ईश्वर का राज ये है
न समझ सके जो लोग इस बात को उनमे शेष ये दर्द मेरे दिल में रह गया, मैं न समझा स् का खुद ही नदी की ओर चल दिया
जिसने मेरे दिल को आईने में देखा उसे, वो मेरे संग होकर समुंदर में बह गया। उसे न भंवर रोक सकी न वेग वो उस तट पर पहुच गया जहाँ गुरु घाट पर बैठ कर इंतजार कर रहे थे मुझे क्या पता था कि मैं भी लहर के एक झोंके में कैसे उनकी शरण मे पहुच गया अब मैं
किसे बताऊँ मेरे दिल।का राज ये दिल एक ही शक्तिपात में गुरु क्या होता जान गया मिली वो रहमत जो बया से बाहर है कि कैसे मिलती है ये दास एक बार मे अनाहद प्राप्त कर शुण्य हो महा शुण्य के समुंदर में बहने लग गया जानता हूं
जिस पर नज़र करम मेरे ईस्ट रूपी परमात्मा की इंसा के रूप में हो जाए, वह पहचान ले और उसी का हो जाये और उसके चरणों मे खो जाए जानले की कौन।
किस रूप में मेरे रहबर बन के आये कुछ सवाल अपने मन मे लेकर, आये थे परखने को, मुझे ओर परख कर अपनी दुवा से पूर्ण कर लौट गए फिर न मिले मुझे इसी बात का अफसोस है हाँ मेरे रहबर मुझे सबकुछ एक बार मे दे वो न जाने किस लोक में चले गए लोग कहते है ऐसे व्यक्ति देवलोक से ऊपर सतलोक परमात्मा के करीब से इस बहु लोक में आते है छोये है जो संस्कारी जन्म जन्मो से साथ उन्हें पहचान कर दे गए या थे परिचित पूर्व कंम कर उनसे मिल उनकी सिफारिश पर अनपढ़ को वो गयं दे गए कहते है जिसे परमात्मा उसका भेद दे और चले गये उनको आगे जो
झुक गए वो पार हुए, जो अड़े रहे भटकने रहे इस भौतिक संसार मे वो खाली ही रह गए ये उनके अंदर विसवास या
समझ का फेर है दोस्तों जानता हूं जिन्हें न मिला इसमे, मेरे रहबर का क्या कसूर है जन जन के लिए उनका दर खुला था जो आगया वो पा, गया पर हर किसी की किस्मत इतनी प्रबल नही या मेरे रब को मंज़ूर नहीं थी उनको कुछ मिले
उसने मुझे जो सबक शून्यका सिखाया, उसमे मिट जाना आसान नहीं,
खुद को खोकर खुद को पाना, हर इंसां के बस की बात नहीं।
फकीरी का ये राज निराला, हार में ही जीत मिली,
जब अना की दीवार गिरी, तब रहमत की रीत मिली।
अब न कोई शिकवा दिल में, न किसी से गिला रहा,
जो गुरु का हो गया पूरा, उसका सब कुछ मिला गया।
अब बस ये हाल हुआ मेरा जो समझ के बाहर है —
न मैं हूँ और न कोई मेरा है,
अब जो कुछ है वो वही है, उसी की मेहेर है जानता हूं
दिल भी उसका, सवेरा भी उसका है।
तेरा होकर जीना सीखा, तेरी याद में मरना है,
ए रहबर तेरे कदमों में ही, शून्य बनकर ठहरना है। मेरी सोच के अनुसार ये गुरु के शब्द जैसे है जैसे कोई मन के भीतर बैठ कर कह रहा हो ओर मैं लिख रहा हु

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