आध्यात्मिकता में पूर्ण गुरु (कामिल गुरु / सतगुरु) की तुलना अक्सर जहाज के कप्तान या मल्लाह से की जाती है। यह बहुत गहरा प्रतीक है।
. संसार = भंवर या समुद्र
आध्यात्मिक दृष्टि से यह संसार एक भवसागर या तूफ़ानी समुद्र माना गया है।
इसमें मोह, माया, अहंकार, कामना = लहरें
जन्म–मरण = ज्वार-भाटा
अज्ञान = अंधेरा
मनुष्य एक यात्री है, जिसे पार जाना है।. गुरु = जहाज का कप्तान
पूर्ण गुरु जहाज के कप्तान जैसा होता है।
कप्तान की विशेषताएँ:
रास्ता जानता है
तूफान पहचानता है
दिशा नहीं भूलता
यात्रियों को सुरक्षित पार लगाता है
इसी प्रकार पूर्ण गुरु:
आत्मा का मार्ग जानता है
साधना के भंवर पहचानता है
शिष्य को भटकने नहीं देता
परम सत्य तक पहुँचाता है
इसलिए संत कहते हैं:
“गुरु बिना भवसागर पार नहीं।”
गुरु = मल्लाह (केवट)
कभी गुरु को मल्लाह या केवट भी कहा गया है।
मल्लाह:
नाव को संतुलित रखता है
धारा के अनुसार चलाता है
पार उतार देता है
गुरु:
शिष्य के मन को संतुलित करता है
साधना का सही तरीका देता है
मुक्ति तक पहुँचाता है. आध्यात्मिक प्रतीक का गहरा अर्थ
यह प्रतीक बताता है:
नाव = साधना
समुद्र = संसार
यात्री = जीवात्मा
कप्तान = गुरु
किनारा = मुक्ति / ब्रह्मज्ञान / महाशून्य
. उच्च अवस्था में गुरु क्या करता है
पूर्ण गुरु केवल रास्ता नहीं दिखाता —
वह तवज्जुह, कृपा और शक्ति से शिष्य के भीतर मार्ग खोल देता है।
तब:
दशम द्वार खुलता है
नाद सुनाई देता है
शून्य और महाशून्य का अनुभव होता है. संतों का संकेत
कई संतों ने कहा है:
“गुरु नाव है, नाम पतवार है, और कृपा हवा है।”
तब शिष्य सहज पार हो जाता है
पूर्ण गुरु कप्तान से भी बड़ा क्यों माना गया है — क्योंकि अंत में गुरु जहाज नहीं चलाता बल्कि शिष्य को खुद समुद्र बना देता है।
अध्ययतम की दुनिया जहा गुरु ईश्वर से ज्यादा ऊना महत्व रखता हैं इसलिए कि पूर्ण गुरु कप्तान से भी बड़ा क्यों माना गया है — यह आध्यात्मिकता का बहुत ऊँचा रहस्य है।
. साधारण कप्तान क्या करता है
जहाज का कप्तान:
यात्री को एक किनारे से दूसरे किनारे ले जाता है
रास्ता दिखाता है
लेकिन यात्री वही रहता है
यानी: कप्तान पार उतार देता है, पर यात्री को कप्तान नहीं बनाता।
पूर्ण गुरु क्या करता है
पूर्ण गुरु केवल पार नहीं उतारता —
शिष्य को अपने जैसा बना देता है।
सूफ़ी और योग दोनों में कहा गया है:
पहले शिष्य = नाव में यात्री
फिर शिष्य = नाविक
अंत में शिष्य = समुद्र
यही अवस्था होती है:
फना
ब्रह्मज्ञान
महाशून्य
गुरु की अंतिम कृपा
शुरू में:
गुरु रास्ता दिखाता है
बीच में:
गुरु तवज्जुह देता है
दिल रोशन करता है
अंत में:
गुरु मिटा देता है “मैं” को
तब शिष्य समझता है:
मैं अलग नहीं हूँ।
यही अवस्था अद्वैत (Advaita) की है।
. अंतिम सत्य
पूर्ण गुरु की अंतिम शिक्षा यह होती है:
नाव भी तुम हो
समुद्र भी तुम हो
किनारा भी तुम हो
गुरु केवल पर्दा हटाता है।
. आध्यात्मिक रहस्य
इसलिए संत कहते हैं:
“गुरु पार नहीं लगाता — गुरु पार बना देता है।”
और यही सबसे ऊँची अवस्था है:
अनाहद नाद
शून्य
महाशून्य
निर्विकल्प समाधि
अगर आप चाहें तो मैं बताऊँ सच्चे पूर्ण गुरु की पहचान क्या होती है क्योंकि हर गुरु जहाज का कप्तान नहीं होता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *