मेरी इन पंक्तियों में बहुत गहरी आध्यात्मिक पीड़ा छुपी हुई है जिसे मैं ही जानता हूं और कहता हूं मेरा दर्द तुम न जान सके मुझे तुम से शिकवा क्या और साथ ही आशा का प्रकाश भी क्या मेरा यह भाव सूफी और वेदांत दोनों परंपराओं में बार-बार दिखाई देता है। मेरे दिल।के जख्मो के भाव का सार कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है:
“मेरे दामन में इतने दाग थे कि अपने कर्मों से भी उन्हें साफ न कर पाया।
लोग मुझे ऐसी जगह ले गए जहाँ केवल कीचड़ ही कीचड़ था।
लाचार होकर उसी कीचड़ में सना हुआ मैं अपने आका के पास पहुँचा।
हाल सुनाया तो वे मुस्कराए और बोले —
बेटा, कमल भी तो कीचड़ में ही खिलता है।”
इसका आध्यात्मिक अर्थ बहुत सुंदर है . दाग — हमारे कर्म, भूलें और अहंकार
मनुष्य से गलतियाँ होती हैं। कर्मों के दाग कभी-कभी इतने भारी लगते हैं कि लगता है उनसे मुक्ति असंभव है।. कीचड़ — जीवन की परिस्थितियाँ
अपमान, संघर्ष, दोषारोपण, असफलता — यही वह “कीचड़” है जिसमें जीवन हमें डाल देता है।
आका / गुरु — करुणा का स्रोत
सच्चा गुरु या परमात्मा दोष नहीं गिनता, वह संभावना देखता है।
. कमल — आत्मा की जागृति
कमल की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह कीचड़ में जन्म लेता है लेकिन उससे अछूता रहता है।
इसीलिए भारतीय दर्शन में कमल को पवित्रता, जागृति और ईश्वर की निकटता का प्रतीक माना गया है।
अर्थ यह हुआ:
जिसे दुनिया गिरावट समझती है, वही कभी-कभी आत्मा के खिलने की जमीन बन जाता है।
सूफी संत अक्सर कहते हैं:
“जिसे तू अपनी बदनसीबी समझ रहा है,
वही तेरे रब की तरफ से तेरी तालीम भी हो सकती है।”
और वेदांत की भाषा में कहें तो
मल (दोष), विक्षेप (भटकाव) और आवरण (अज्ञान) के बीच से ही आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है।
इसलिए आपके गुरु के शब्द बहुत गहरे हैं:
“कीचड़ से घबराना नहीं, वही कमल बनने की जमीन है।” ताभि ये वाकया ध्यान में आया कि
एक शिष्य बहुत दुखी होकर अपने आका के पास आया।
उसने कहा — “मालिक, मेरे दामन पर इतने दाग हैं कि मैं खुद से भी नज़र नहीं मिला पाता। लोग मुझे गिरा हुआ कहते हैं। मेरी ज़िंदगी तो कीचड़ बन गई है।”
आका मुस्कराए और उसे अपने साथ तालाब के किनारे ले गए।
तालाब में चारों ओर कीचड़ था, लेकिन उसी कीचड़ के बीच एक सुंदर कमल खिला हुआ था।
आका ने पूछा —
“तुझे क्या दिख रहा है?”
शिष्य बोला —
“मालिक, कीचड़ में खिला हुआ कमल।”
आका बोले —
“बस यही तेरी कहानी है।
कमल अगर साफ़ पानी में पैदा होता तो उसकी महिमा कौन जानता?
उसकी सुंदरता इसलिए है क्योंकि वह कीचड़ में जन्म लेकर भी उससे अछूता रहता है।”
फिर आका ने कहा —
“जिसे तू अपनी गिरावट समझ रहा है,
वही तेरे अंदर कमल खिलाने की ज़मीन है।
अगर तू सच्चे दिल से मालिक की ओर मुड़ जाए,
तो कीचड़ भी तेरी इबादत बन सकता है।”
शिष्य की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने समझ लिया कि दाग़ अंत नहीं हैं — वे जागरण की शुरुआत भी हो सकते हैं।
कभी-कभी परमात्मा इंसान को ऊँचा उठाने के लिए उसे पहले कीचड़ से गुज़रने देता है,
ताकि जब कमल खिले तो उसकी खुशबू दूर-दूर तक फैले।
जान गया जो कीचड़ मेरे मन और शरीर पर लगा वो मेरे कर्मो को बयां करता था पड़ी गुरु देव की नजर तो वही कीचड़ जो।लगा था कर्मो को धो गया बन के कीचड़ से कमल ऐसा निकल की गुरु में रम गया