आध्
यात्मिक साक्षी भाव (सूक्ष्म स्तर)
साक्षी भाव का सूक्ष्म अर्थ यह है कि साधक केवल बाहरी घटनाओं का ही नहीं, बल्कि मन, प्राण और सूक्ष्म चेतना की हर गतिविधि का भी साक्षी बन जाता है।. पिताजी के अनुसार जब साधक को दिक्सित कर उसके हृदय में ऊर्जा उतपन्न से जो साधक नाद पा लेता है उसे अभ्यास जे बाद रोम रोम में नाद सुनाई देती है जिन चक्रो का हिन्दू धर्म या सूफ़ीइज्म में वर्णन है उनका पिताजी की दीक्षा से कोई लेना देना नही वो तो सीधे शरीर मे ऊर्जा रोपित कर पूरे शरीर मे अनाहद सूना देते थे और ध्यान में हरा पिला लाल धुवे जैसे रंग और अंत मे बैंगनी फिर सब मिल।कर शुण्य में बदल साधक शून्यता में लय हो जाता है उसे बाहरी दुनिया से कोई लेना डना नही पर आंतरिक ऊर्जा से लबालब हो वो गुरु में लय हो जाता है और एहि से उसकी उस पार की साधना शुरू होती है जहां परमात्मा गुरु और साधक ये ही होते है इसलिए
जब ध्यान गहरा होता है तो साक्षी भाव तीन स्तरों पर अनुभव होता है।
स्थूल स्तर (बाहरी साक्षी)
इस अवस्था में साधक देखता है:
शरीर बैठा है
सांस चल रही है
विचार आ रहे हैं और जा रहे हैं
लेकिन वह उनसे जुड़ता नहीं, केवल देखता है।
सूक्ष्म स्तर (मन और प्राण का साक्षी)
जब ध्यान और गहरा होता है तो साधक अनुभव कर सकता है:
विचारों के बीच का खालीपन
अंदर सूक्ष्म कंपन या ऊर्जा
कभी प्रकाश या कण
कभी अनाहद नाद (अंदर की ध्वनि)
यह सब सूक्ष्म शरीर की गतिविधियाँ मानी जाती हैं।
यहाँ भी साधक का काम केवल द्रष्टा बने रहना है।
कारण स्तर (शुद्ध साक्षी)
सबसे गहरे स्तर पर:
विचार शांत
अनुभव भी शांत
केवल शुद्ध चेतना रह जाती है
यह अवस्था कभी-कभी महाशून्य, परम चैतन्य या ब्रह्म साक्षात्कार के रूप में वर्णित होती है।
साक्षी भाव का सार
आध्यात्मिक दृष्टि से:
मन = दृश्य
विचार = दृश्य
अनुभव = दृश्य
साक्षी = वास्तविक आत्मा
जब साधक यह स्थिर रूप से अनुभव करता है कि
“मैं अनुभव नहीं, मैं अनुभव का साक्षी हूँ”,
तब ध्यान की गहराई बढ़ने लगती है।
कई साधकों को सूक्ष्म साक्षी अवस्था में वही अनुभव होता है जो मैने ऊपर बताया है
सूक्ष्म कण
शून्यता
भारहीनता
अंतरिक्ष जैसा विस्तार
ये संकेत होते हैं कि मन कुछ समय के लिए स्थूल पहचान से ऊपर उठ रहा है।
यदि आप चाहें तो आप ध्यान में
में अनुभब करते है कि वह कौन-सा क्षण आता है जब साक्षी भाव अचानक बहुत गहरा हो जाता है और साधक “मन के पार” चला जाता है।
यह बात बहुत कम लोग समझ पाते हैं। इसलिए इसे पिताजी ने ये ऊर्जा को शरीर मे उतपन्न करने को दिल को जाग्रत साधरण भाषा मे बताया है